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Saturday, 3 December 2016

गणगौर

जवारे
पूजा के लिए जवारे चाहिए रहते है। होलिके दूसरे दिन नया फैलाव वाला गमला लेकर उसमे मिटटी डाल दे और एक मुठी गेहू इस मिटटी पर डालकर रखदे। हर रोज पानी दे। गणगौर तक हरेभरे जवारे उग आएंगे। इस गमले में दो छोटी बास की लकड़िया लगाकर रखे और उसे कपास और रेशमी कपडे के मदतसे सजाये ताकि वो ईसर और गोरादे के प्रतिक बन सके।

सिंजारा 
चैत्र शुद्ध द्वितीयाके दिन गणगौर का सिंजारा रहता है। इस दिन बाल धोना और मेहंदी लगाना। गणगौर को भोग लगाने के ले लिए गुड और गेहू के फल आप चाहे तो सिंजारेके दिन बना कर रख सकते है।

पूजा की तैयारी 
दिवार पर गोरादे और ईसरजी मतलब पार्वतीजी और शंकरजी, चाँद, सूरज, स्वस्तिक, इत्यादी चीजे निकाले। पूजाके लिए थालीमे हल्दी, कुकू, चावल, मेहंदी, मोली, वस्त्र, काजल, पान, सुपारी, रूपया, कपूर, धुपारती, कच्चा दूध (गायका दूध जो उबाला नहीं हो।) ये चीजे रखले।यथा शक्ति सोलह श्रृंगारका सामान माता को चढ़ा सकते है। दातन मतलब निमकी सोलह छोटी लकडिया बांध कर लेना तथा कवारी कन्याके सोलह फल और विवाहित स्त्री के आठ फल चढ़ाना पड़ता है।

व्रत की विधि
चैत्र शुद्ध तृतीया के दिन गणगौर रहती है। इसी दिन गौरी तृतीया रहती है। इस दिन सबेरे जल्द से जल्द प्रातः विधि पूर्ण करके विवाहिता आठ फल, सुपारी और रूपया लेकर व्रत के पालन का संकल्प ले। इस दिन एक समय खाना खाकर व्रत किया जाता है। विधिवत पूजा करके खाना खाया जाता है।


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Tuesday, 4 August 2015

दही रोटी


बीस बरस का पिवजी हमारा,पचीस बरस घरनार।
हमारी जोडी हिलतीजी मिलती ॥टेर॥

चांदार चांदन माथोजी न्हायो,तो सूरज किरण गूथायो ॥१॥

डाबोजी खोलर नथणीजी पेरी,डाबोजी खोलर गेणोजी पे-यो ॥२॥

पेटीजी खोलर कपडाजी पे-या,तो पेरी कसुंबल साडी ॥३॥

रिमझिम करता महल पधा-या,तो राजिंद मांग दही रोटी ॥४॥

घमघम करता हेटजी उत-या,जाय भाभीजी जगायाजी ॥५॥

उठो भाभीजी थाका देवर हट लाग्या,आदिका मांग दही रोटी ॥६॥

म्हार तो सार नही छ दिवराणी,जाय बाईजी जगाओजी ॥७॥

उठो बाईजी थाका बिरा हट लाग्या,आदिका मांग दही रोटी ॥८॥

म्हार तो सार नही छ भोजाई,जाय माऊजी जगाओजी ॥९॥

उठो सासूजी थाका जाया हट लाग्या,आदिका मांग दही रोटी ॥१०॥

फ्रीजम पडीए बव्हड दहिरी कुंडी,डाबाम थंडी रोटी ॥११॥

रिमझिम करता मेहल पधा-या,ओ ल्यो राजीन्द दही रोटी ॥१२॥

भाभीजीर छान ल्याई दही रोटी,बाईजीर छान ल्याई दही रोटी ॥१३॥


सासुजीर छान ल्याई दही रोटी,तो मोरासु निवालो भरावोजी ॥१४॥


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नथनी

आली जाज्यो, पाली जाज्यो, जाज्यो समुद्रापार।
नथजोगा मोती ल्याज्यो,लाला ल्याज्यो चार।
भोळा बाईसारा बिर, मुखडार मांडन नथ ल्याज्योजी।
सेज सवाई ढोला आया रिज्योजी ॥धृ॥

दसरी घडाव म्हारा देवर जेठ,बिसरी घडाव म्हारा पिया परदेश।
मुखडार मांडन नथ ल्याज्योजी,भोळा बाईसारा बीर ॥१॥

दसरी तो नथ म्हारी लुळ लुळ जाय।
बिसरी तो नथ म्हार उभी झोला खाय,भोळा बाईसारा बीर ॥२॥

आलनपुरको घागरो, ब-हानपूरको चीर।
मुंबईसु साडी ल्याया, ल्याया ठिकठिक,भोळा बाईसारा बीर ॥३॥

फाट गयो घागरो, उधड गयी चीर।
देखो सासुजी थाका जायारी खरीद,भोळा बाईसारा बीर ॥४॥

मती बोलो ए बवड आडा तेडा बोल।
म्हारा जायोडो थान, ल्याया ह मोल,भोळा बाईसारा बीर ॥५॥

मती बोलोजी सासुजी, आडा तेडा बोल।
थाका जायोडा म्हारा नथनीरा मोल,भोळा बाईसारा बीर ॥६॥

नथ बदगी मोती बिखर्‍या जाउरे बलाय,
आवला बाईसारा बिरा, लेऊनी पुवाय,भोळा बाईसारा बीर ॥७॥

अळ्या धुंडी, माळ्या धुंडी, धुंडी मेला माय।


छोटीसी नथ लादी भंवर पटारे माय,भोळा बाईसारा बीर ॥८॥ 



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नागपंचमीकी कहाणी

एक शहरमे एक ब्राम्हण रहता था। ऊसकी पाच बहुए थी। सावनका महिना आया। बडी चार बहुए अपने अपने मायकेगयी। छोटी बहू के मायकेमे कोई नही था। इसलीये वह अपनेही घरमे रुक गयी।

सावन शुद्ध पंचमीके दिन नागपंचमीका त्यौहार आया। छोटी बहुने नाग देवतासे प्रार्थना की,“हे नाग देवता, मेरे मायकेमे कोई नही इसलीये मुझे मायकेमे रहनेका सुखनही है। आपही मुझे मायकेका सुख दीजीये।“

शेषनागजीको ऊसकी दया आयी। शेषनागजी मनुष्य रूप लेकर उस ब्राम्हणके घर आये और बोले,“मै आपकी छोटी बहुका मामा हू। इतने दिन मै परदेस था इसलीये मै विवाहके समय नही आ पाया था। मै अपनी भांजीको लेजाने आया हू।“

ब्राम्हणने शेषनागजीकी बातपर भरोसा किया और बहुको रवाना किया। बहू मनमे सोचने लगी,‘ये मामाजी कहा ले जायेंगे?’ उतनेमे नागकी बांबीआयी। नागदेवता अपने असली रूपमे आये। वह बहू डर गयी। तब शेषनागजी बोले,“डरो मत बेटी, तुमने मुझे याद किया इसलीये मै तुम्हे लेने आया। तुम मेरी पुछ पकडकर मेरे पीछे आ जाओ।“

घर पहोचनेके बाद नागदेवताने नागराणीको बताया, “यह अपनी बेटी है। इसे कोई तकलीफमत देना और सही तरीकेसे अतिथी सत्कार करना।“

एक दिन नागराणीकी जचकी हुई। छोटी बहू हाथमे दिया लीये खडी थी। छोटे छोटे नाग के बच्चे हिलडूलरहे थे। ऊनको देखकर छोटी बहू डर गयी और उसके हाथसे दिया गीर गया। इस वजहसे छोटे नागकी पुछ जल गयी। नागराणीको यह देख गुस्सा आया और उसने शेषनागजीसे कहा,“ईसे अपने सासुराल पहुचा दिजिये।“ शेषनागजीने सोने चांदीका नजराणा दिया और मनुष्य रूप लेकर छोटी बहुको उसके सासुराल पहुचा दिया।

दिन बितते गये और नागदेवताके बच्चे बडे हो गये, तब उन्होने अपनी पुछ के बारेमे पुछा। तब नागराणीने सारी हकिगत बतायी। सब सुनकर बच्चोको गुस्सा आया और वह उस छोटी बहुको डंख करनेके लीये उसके घरकी तरफ निकल पडे।

उस दिन नागपंचमी थी। छोटी बहूको अपने नाग भाईयो याद आयी। उसने दीवारपर नागदेवताका चित्र निकाला,पुजा की, दूध और ज्वारीकी लाहीका भोग लगाया। उतनेमे नाग के बच्चे वहा पहुचे। उन्होने देखा की छोटी बहू नागदेवतकी पुजा कर रही है। उन्होने ऊसकी प्रार्थना सुनी, “हे नागदेवता, मेरे पुछजलेभाई जहा भी होंगे उन्हे राजीखुशी रखीये, और ऊनको हमेशा सुखी करीये।“

यह सुनकर नागके बच्चोका गुस्सा शांत हो गया और ऊनके मनमे छोटी बहुके लीये प्यार उमडने लगा। इसलीये वह रातभर उसके यहा रुके। अगले दिन दूध पिकर और लाही खाकर अपनी बहनको नवलखा हारका तोहफा देकर नागदेवता चले गये।
हे नागदेवता छोटी बहुको जैसे मायकेका सुख और भाईका प्यारदिया वैसेही सभीको दिजिये।


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Monday, 3 August 2015

दिये की अमावस्या

एक राजा था। उसे एक बेटा और एक बहू थे। बहुने एक दिन घरमे रखी मिठाई चुरकर खा ली और चुहे का नाम लिया। ये सूनकर घर मे रहने वाले सभी चुहोको को गुस्सा आया। सभी चुहोने मिलकर तय किया की राजा की बहू को सबक सिखएंगे।


एक दिन राजा के यहा मेहमान आये। चुहोने मेहमानोके बिस्तरमे राजाकी बहू की चोली रख दी। अगले दिन सबेरे घरके नौकर लोगोने देखाकी बहुराणी की चोली मेहमानोके बिस्तर से मिली और पुरे राजमहल मे एकही बात के चर्चे होने लगे, “बहुराणी की चोली मेहमान के बिस्तर से कैसे मिली?“ राजमहल मे सभी लोग बहुराणी की निंदा करने लगे और उसे राजमहल से निकाल दिया गया।



उस बहू का एक नियम था की रोज दिये अच्छेसे चमकाना और सुबह शाम संध्या समय दिये लगाना। और साल मे एक बार मतलब श्रावण अमावस्या के दिन याने दिये की अमावस्या के दिन मिठी रसोई बनाना,दियोकी पुजा करना और भोग लगाना। ये सब वह बहुरणीही करती थी।


पर जबसे बहुराणी को घर से निकाल दिया गया, घरके दिये किसीने साफ नही किये। दीप अमावस्या के दिन किसीने भी दिये चमकाये नही, मिठी रसोई बनाई नही, दीयो की पुजा नही हुई,भोग नही लगा और दिये भी जलाये नही।


उसी दिन राजा अपने मंत्रीयो और राजकुमार के साथ शिकार करने गया था। वह लोग राजनगरी लौट रहे थे तो उतनेमे रात हो गयी। राजा और उसके सभी साथी एक जगह विश्राम के लीये रुक गये। आधीरातको राजा की निंद खुली और वह उठकर बैठा तो उसे एक चमत्कारिक घटना दिखी।राजाने देखा पासके बरगद के पेड पर राजा की नगरी के सभी दिये आकर बैठे है। सब दिये आपस मे बात कर रहे थे की आज किसने क्या खाया? कैसी पुजा हुई? इतनेमे एक दिया बोल पडा,“पिछले दस साल मे सबसे अच्छा भोग और पुजा मेरी हूआ करती थी पर इस साल तो मेरा नसीब ही फुटा है। इस बार तो मेरी पुजा ही नही हुई तो भोग बहोत दूर की बात है।“



फिर बाकी दियोने पुछा,“भाई तुम्हारे साथ ऐसा कैसे हूआ? इसकी क्या वजह है?” तब वह दिया बोला,“मै राजाके घर का दिया हू। राजाके घरमे एक बहुराणी थी। एकदिन उसने घरकी मिठाई चुराकर खा ली और चुहोका नाम बताया। इस बात का चुहोको गुस्सा आया और बहुराणी को सबक सिखानेके लीये चुहोने बहुराणी की चोली मेहमानोके बिस्तरमे रख दी। इस वजह से बहुराणीकी बहोत निंदा हुई और उसे घरसे निकाल दिया गया। राजाके घरमे सिर्फ बहुराणीही मेरी पुजा करती थी। मीठा भोग लगाती थी। इस साल वो नही है इसलीये मेरा नसीब फुटा है। वह जहाभी होंगी सुखी रहे।“ ऐसा आशीर्वाद उस दिये ने दिया।


राजाने यह सब बाते सूनली और उसे अपनी गलती समझ गयी और बहुराणी निर्दोष है यह बात भी पता चल गयी। अगले ही दिन राजा बहुराणीको निर्दोष घोषीत किया और बडे सम्मानके साथ उसे राजमहल वापस ले आया। पुरा राजपरिवार फिरसे राजी खुशी साथ रहने लगा और राज्य मे खुशहाली छा गयी।

हे दीप देवता आपकी कहाणी जिसनेभी पढी और सुनी ऊसकी भूल चूक माफ करीये, घटती की पुरी करीये।
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Sunday, 22 March 2015

गोर की कहाणी - पेट की ढकणी

चैत्र का महिना आया. तब गौरादेजीकी (पार्वती) मायके जाने की इच्छा हुई.

फिर उन्होने ईसरजी (महादेव) को पुछा, "ईसरजी मुझे पिहर जाने की इच्छा है." 

तब ईसरजी ने कहा, "मै भी साथ चलता हु."


गौरादे ने कहा, "मुझे शरम आती है."


ईसरजी बोले, "घुंघट निकाल लो."


गरमी का बहाना बनाते हुए गौरादे बोली, "महाराज मुझे सोलह दिन का पीहर वास दो. आप चैत्र शुद्ध दुज के दिन मतलब सिंजारे के दिन मुझे लेने आ जाना." 

और गौरादे पीहर चली गई. वो दिन चैत्र कृष्ण प्रतीपदा का था. ईसलिए उस दिन से गौर की पुजा करते है. सिंजारे का दिन आया. ईसरजी हिमालय अपने ससुराल पहोच गये. जवाई मेहमान आए इस खुशीमे मेनादे ने अनेक पक्वान्न बनाए. गौरादे ने इस दिन बाल धोए और हाथ पैर मे मेहंदी लगा ली.


दुसरे दिन सोलह श्रृंगार कर गौरादे सबेरे पुजा करने लगी. मेनादे ने बेटी की पूजा के लिये गेहुके आटे की गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी, आटे के फल, डोरा, काच, कंघी, चोटी, कुकू की डिब्बीया इत्यादी चिजे बनाई.


इधर ईसरजी भोजन करने बैठे. उनके मन मे सासुजी की परीक्षा लेने का विचार आया और उन्होने बनाया हुआ सारा भोजन खा लिया. फिर जल्दी वापस लौटने की जीद करने लगे. 


गौरादे की पुजा हो गई और उनको भुख लग  गई. मेनादे ने कहा, "बेटी खाना खत्म हो गया." 


गौरादे ने कहा जो है वो परोसदो. इस  तरह गौरादे आठ फल, गळवाणी  और मेथीकी पिंडोळी खाकर, एक लोटा भर पाणि पीकर कैलास के लिए रवाना हो गई. 


दोपहर की कडी धुप की वजह से ईसरजी और गौरादे पिपल की घनी छाँव मे आराम के लिए रुक गये. बातो बातो मे ईसरजी ने पुछा, "गौरादे आपने क्या खाया?"


गौरादे ने जवाब दिया, "जो आपने खाया वही मैने खाया."


"झुठ मत बोलो." ईसरजी बोले.


गौरादे बोली, "महाराज बेटी जवाई मे कभी फर्क रहता है क्या! आपने जो खाया वही मैने खाया."


बाते करते करते गौरादे को निंद लग गई. मौका देख ईसरजी ने गौरादे के पेट की ढकणी खोल कर देखी तो उसमे आठ फल, गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी और लोटा भर पाणि डळमळ कर रहे थे.


गौरादे जगजाने के बाद ईसरजी बोले, "आपके पेट मे तो आठ फल, गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी और लोटा भर पाणि डळमळ कर रहे है. आपने झुठ बोला."


कैसे पता चला ऐसा गौरादे ने पुछा. तब ईसरजी बोले, "मैने आपके पेट की ढकणी खोल कर देखी."


तब गौरादे बोली, "महाराज ये आपने क्या किया. आज आपने देखा कल कोई और देखेगा. पेटमे क्या है यह जानने के बाद बेवजह कलह होंगे और इससे संसार मे अशांती बढेगी."


पहले पेटकी ढकणी खुला करती थी. पर गौरादे की चिंता जानने के बाद ईसरजी ने पेटकी ढकणी को उलटा रख कर हमेशा के लिए बंद कर दिया.


हे ईसरजी मेनादे और गौरादे की जैसी परीक्षा ली, वैसी किसीकी न लेना. घटती की बढती कर दो. अधुरी की पुरी कर दो. सबकी सुख समृद्धी कर दो. सुहाग अमर रख दो. भूल को माफ करदो.


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Saturday, 11 October 2014

करवा चौथ की कहाणी


करवा चौथ की कहाणी

एक सावकार हो। बिक सात बेटा और एक बेटी ही। बेटी घणी लाडली ही । सब भाई बेन रा ब्याव हुइग्या हा । कातीको महिनो आयो । करवा चौथ रो त्योहार आयो । सगळी भोजाया बरत करी जणा नणंद बोली, " म भी यो बरत करीस। " बिका भाई बोल्या, " बेन थारसू नही होबालो तू मती कर । " बेन मानी कोणी । बा बरत करी ।

दिन बितग्यो शाम हुईगी । साब भाई खेता सू आबा लाग्या । कोई बोर लायो, कोई काचरो लायो, कोई बाजराको सिदयो लायो, कोई आवलो लायो । बेन न खावाको कयो। बा कयो, "म्हारो तो बरत ह , म कोणी खावू। " जणा भाई पुछ्या , " बेन थारो बरत कणा छुटी?" बेन बोली, " रातरा चाँद निकली, म चाँद की पुजा करीस, चौथ मातारी पूजा करीस करवो पिया फेर म खाइस। "

भाई बोल्या, " चाँद न उगबाण काई देर लाग। अबार उगावा चाँद। " एक भाई लकड़्या लेयर डूंगर ऊपर चढग्यो और लकड़्या शिलगाय दी। एक भाई उचा पेड़ पर चढग्यो और महीन जाली जलता लकड़्या रा सामन पकड्यो। एक भाई घर आयो और बेन न बोल्यो, "बाई बाई चाँद उग आयो। चाल चाँद देखबान। "

बेन अपरा भोजयान बोली, "चालो चाँद उग आयो। " जना भोजया  बोली, "बाईजी थाको  चाँद उग्यो होइस म्हाको नई। थे जाओ म्हे तो नहीं आवा। " जना  भाई बोल्यो, " बाई तू थारी चाँद देखले, अ कराई  देखी। जल्दी चाल। "

बेन चौथ माता री  पूजा करी। और पुजारी थाली लेयन चाँद न अरग देबान गयी। भाई बतायो , "बाई देख डूंगर ऊपर चाँद उग्यो ह। " चाँद न अरग डेयर बा आई आई और बोली, "भोजाई मन करवो पिवणु ह। " भोजाई बिन करवो पिलाई।
१) करवो पि ये करवो पी , म्हारी बाई करवो पी।
२) करवो पि ये करवो पी , सात भाया की बेन  करवो पी।
३) करवो पि ये करवो पी , घनी भुक्यालु  करवो पी।
४) करवो पि ये करवो पी , बरत भाणबाली करवो पी।
५) करवो पि ये करवो पी , डूंगर ऊपर लाय लगानी  करवो पी।
६) करवो पि ये करवो पी , चालनी म चाँद देखबाली  करवो पी।
७) करवो पि ये करवो पी , घनी तिसालु  करवो पी।

इशो बोलर करवो पायो और बेन जीमण बेठी। पहिलो कवो खारो  लाग्यो , दूजा क़वाम  केस आयो , तीजो कवो खायो तो पती समाय गयो इशी खबर आई। कवो थूक कर बा थाली सरकाय दिनी और सासर जावन निकली। बिकी माँ बिन रुकयो और पेटी  मायसु बेस निकालने  बिन ओढ़ायो।  पेटी मायसु  काळो बेस निकल्यो।  बा काळो  बेस और काली चोळी पेनर निकल गयी।  बिकी माँ बोली, " रास्ताम पेड़ पौधा,कीडा,जिनवर, मिनख जो भी मिली सबरा पगा  लागजे। "

बेन निकली।  माँ बोल्यो ज्यान रास्ताम जो भी मिल्यो सबरा पगा लगी। सासर पूगी। सबरा पगा लागि। पलना म जेठुती सूती हि। बीरा भी पगा लागि , जना दूध पिवता जेठुतीन वाचा फूटी और बा बोली, "हे बरत भानबली , म थन काई आशीर्वाद देवू। म्हारा पगा केन लागी ?" जना बा बोली, "सवाग भाग अमर रई इशो आशीर्वाद दे देवो। " जेठुति आशीर्वाद दिनों।

जठ पाती न सुवण्यो  बठ बा गयी। बा धनी न लेजाबा कोणी देव ही।  पर गावका लोग धनी को शरीर लेने नदी किनार स्मशान म लेकर गया। बा धनि का लार लार नदी किनार गयी। बठ बा धनी न जलाबा दियो कोणी और नदी किनार म-योड़ा धनि न लेयर झोपड़ी बाँध कर रेवा लागि।

यान करता करता दिन बीतता गया। एक दिन माहका महिनाकी चौथ आई। गाजती घोरती चौथ माता आई।  माता झोपडीन लाथ मारी तो झोपडीको खुणो  उडग्यो। बेन डरती रोवती चौथ माता का पग पकड़ी। जना चौथ माताजी बोल्या , "पापी, दुष्टणी , बरत भानबली, म्हारा पग क्यों पकड्या?" जना बा बोली, "माता थाका पग पकङु नहीं तो कुनका पकङु?" जना चौथ माता बोली, "म्हारा पग छोड़ दे। म्हारा बीच म्हारी बड़ी बेन ह  बैसाख की चौथ बा थारा धनीन उठायर बेठतो करिस। "

काई दिन बाद बैसाख की चौथ आई। गाजती घोरती बैसाख की चौथ माता आई और झोपडीन लेथ मरण दुसरो खुनो उड़ाय दियो। बा आई और बैसाखरा चौथ माता का पग पकड्या।  जना माता बोली, "पापी, दुष्ट, बरत भानबाली म्हारा पग क्यों पकड्या। " बा बोली, "माता म्हारा धनीन उठायर बेठतो करो। " जना बैसाख की चौथ माता बोली, "म्हारा पग छोड़ दे। म्हारा बीच भादवा की चौथ माता बड़ी बेन ह। बा थारा धनी न जीवतो करिस।"

दिन बीतता गया और एक दिन भादवा की चौथ आई।  भादवा की चौथ माता गाजती घोरती आई और लाथ मारकर झोपडीको तीसरो खुनो उडाय दियो। बा माता का पग पकड्या और बोली, "माता म्हारा धनी  न जीवतो करो। " जना भादवा की चौथ माता बोली, "पापी, दुष्टनी , बरत  भांनबाली म्हारा पग छोड़ दे। कार्तिक महीना की करवा चौथ म्हारी बड़ी बेन ह। बा थारा धनी  न जीवतो करिस। बीरा पग छोड़जे मति। "

काई दिन बाद कार्तिक महिनारी चौथ आई। गाजती घोरती चौथ माता आई और झोपडीन लाथ मारी तो पूरी झोपड़ी उड़गी। बा आई और माताका पग पकड़ी और बोली, "माता मन माफ़ करो। म्हारा पती न जीवतो करो। " जना माता बोली, "तू बरत भंग क-यो जीरा लिय इत्तो दुःख हुयो। पर थारी जेठुति थन सदा सवागन को आशीर्वाद दियो जिका लिय म थारा धनी न जीवतो करू। " अमृत को छाँटो देयर बीको पती  जीवतो का-यो  और चौथ माता चली गयी।

धनी  उठन बेठ्यो। बा सासु सुसरान कयार भेज्यो , "थाका बेटा जीवता हुया। म्हान लेवण आवो। पली  सगळा जना ई बात न झूटो मान्या। पर कोई कयो , "जायने  तो देखा काई सच्ची ह मालूम पड़ी। " टुटोरा नगाड़ा , फुटेरा ढोल , टेढ़ा मुंदरी गितरण्या और ज्वारिका आखा लेयर ये सब लोग नदी किनारा गया। बठ पुगताई ढोल नगाड़ा सुधरगया , टेढ़ा मुंडारी गीतारण्या को मुंडो शिदो हुयग्यो। ज्वारिका आखा मोत्यारा हुयग्या। पच बाजा गाजा सु दोयाका सामां लिया और राजी ख़ुशी सगळा घर लौट आया। बा घर आताही जेठुति  रा पगा लागि।

हे चौथ माता बिन ज्यान टूटी ब्यान सगळां  न टूटज्यो सवाग भाग अमर राखज्यो। खोटी री खरी , अधूरी की पूरी करज्यो।







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Strategic Alliances

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