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Wednesday, 25 March 2020

भारतीय नववर्ष


प्रकृति - 1 जनवरी कोई अंतर नही जैसा दिसम्बर वैसी जनवरी। चैत्र मास में चारो तरफ फूल खिल जाते हैं, पेड़ो पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो तरफ हरियाली मानो प्रकृति नया साल मना रही हो।
वस्त्र - दिसम्बर और जनवरी में वही उनी वस्त्र। कंबल रजाई ठिठुरते हाथ पैर चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है , गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है ।
विद्यालयो का नया - दिसंबर जनवरी वही कक्षा कुछ नया नही। जबकि मार्च अप्रैल में स्कूलो का रिजल्ट आता है नई कक्षा नया सत्र यानि विद्यालयों में नया साल।
नया वित्तीय वर्ष- दिसम्बर जनबरी में कोई खातो की क्लोजिंग नही होती। जबकि 31 मार्च को बैंको की(audit) कलोसिंग होती है नए वही खाते खोले जाते है। सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है।
कलैण्डर-जनवरी में नया कलैण्डर आता है। चैत्र में नया पंचांग आता है उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं । इसके बिना हिन्दू समाज जीवन की कल्पना भी नही कर सकता इतना महत्व पूर्ण है ये कैलेंडर यानि पंचांग।
किसानो का नया साल -  दिसंबर जनवरी में खेतो में वही फसल होती है , जबकि मार्च अप्रैल में फसल कटती है नया अनाज घर में आता है तो किसानो की वार्षिक योजना बनती है।
पर्व मनाने की विधि -  31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर मदिरा पान करते है, हंगामा करते है ,रात को पीकर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी बारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल,और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश 
जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होता है पहला नवरात्र होता है घर घर मे माता रानी की पूजा होती है। शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।
ऐतिहासिक महत्त्व - 1 जनवरी का कोई ऐतेहासिक महत्व नही है,  जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत  भगवान झूलेलाल का जन्म नवरात्रे प्रारंम्भ,  ब्रहम्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना, इत्यादि का संबंध इस दिन से है।
अंग्रेजी कलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगो के अलावा कुछ नही बदला
अपना नव संवत् ही नया साल है।
जब ब्रह्माण्ड से लेकर
सूर्य चाँद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है। जो विज्ञान आधारित है।
तब अपनी मानसिकता को बदले। विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने।
स्वयं सोचे की क्यों मनाये हम 1 जनवरी को नया वर्ष केवल कैलेंडर बदलें। अपनी संस्कृति नही।
आओ जगे जगाये, भारतीय संस्कृति अपनाये, आधुनिक बने ।

Saturday, 3 December 2016

गणगौर

जवारे
पूजा के लिए जवारे चाहिए रहते है। होलिके दूसरे दिन नया फैलाव वाला गमला लेकर उसमे मिटटी डाल दे और एक मुठी गेहू इस मिटटी पर डालकर रखदे। हर रोज पानी दे। गणगौर तक हरेभरे जवारे उग आएंगे। इस गमले में दो छोटी बास की लकड़िया लगाकर रखे और उसे कपास और रेशमी कपडे के मदतसे सजाये ताकि वो ईसर और गोरादे के प्रतिक बन सके।

सिंजारा 
चैत्र शुद्ध द्वितीयाके दिन गणगौर का सिंजारा रहता है। इस दिन बाल धोना और मेहंदी लगाना। गणगौर को भोग लगाने के ले लिए गुड और गेहू के फल आप चाहे तो सिंजारेके दिन बना कर रख सकते है।

पूजा की तैयारी 
दिवार पर गोरादे और ईसरजी मतलब पार्वतीजी और शंकरजी, चाँद, सूरज, स्वस्तिक, इत्यादी चीजे निकाले। पूजाके लिए थालीमे हल्दी, कुकू, चावल, मेहंदी, मोली, वस्त्र, काजल, पान, सुपारी, रूपया, कपूर, धुपारती, कच्चा दूध (गायका दूध जो उबाला नहीं हो।) ये चीजे रखले।यथा शक्ति सोलह श्रृंगारका सामान माता को चढ़ा सकते है। दातन मतलब निमकी सोलह छोटी लकडिया बांध कर लेना तथा कवारी कन्याके सोलह फल और विवाहित स्त्री के आठ फल चढ़ाना पड़ता है।

व्रत की विधि
चैत्र शुद्ध तृतीया के दिन गणगौर रहती है। इसी दिन गौरी तृतीया रहती है। इस दिन सबेरे जल्द से जल्द प्रातः विधि पूर्ण करके विवाहिता आठ फल, सुपारी और रूपया लेकर व्रत के पालन का संकल्प ले। इस दिन एक समय खाना खाकर व्रत किया जाता है। विधिवत पूजा करके खाना खाया जाता है।


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Sunday, 22 March 2015

गोर की कहाणी - पेट की ढकणी

चैत्र का महिना आया. तब गौरादेजीकी (पार्वती) मायके जाने की इच्छा हुई.

फिर उन्होने ईसरजी (महादेव) को पुछा, "ईसरजी मुझे पिहर जाने की इच्छा है." 

तब ईसरजी ने कहा, "मै भी साथ चलता हु."


गौरादे ने कहा, "मुझे शरम आती है."


ईसरजी बोले, "घुंघट निकाल लो."


गरमी का बहाना बनाते हुए गौरादे बोली, "महाराज मुझे सोलह दिन का पीहर वास दो. आप चैत्र शुद्ध दुज के दिन मतलब सिंजारे के दिन मुझे लेने आ जाना." 

और गौरादे पीहर चली गई. वो दिन चैत्र कृष्ण प्रतीपदा का था. ईसलिए उस दिन से गौर की पुजा करते है. सिंजारे का दिन आया. ईसरजी हिमालय अपने ससुराल पहोच गये. जवाई मेहमान आए इस खुशीमे मेनादे ने अनेक पक्वान्न बनाए. गौरादे ने इस दिन बाल धोए और हाथ पैर मे मेहंदी लगा ली.


दुसरे दिन सोलह श्रृंगार कर गौरादे सबेरे पुजा करने लगी. मेनादे ने बेटी की पूजा के लिये गेहुके आटे की गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी, आटे के फल, डोरा, काच, कंघी, चोटी, कुकू की डिब्बीया इत्यादी चिजे बनाई.


इधर ईसरजी भोजन करने बैठे. उनके मन मे सासुजी की परीक्षा लेने का विचार आया और उन्होने बनाया हुआ सारा भोजन खा लिया. फिर जल्दी वापस लौटने की जीद करने लगे. 


गौरादे की पुजा हो गई और उनको भुख लग  गई. मेनादे ने कहा, "बेटी खाना खत्म हो गया." 


गौरादे ने कहा जो है वो परोसदो. इस  तरह गौरादे आठ फल, गळवाणी  और मेथीकी पिंडोळी खाकर, एक लोटा भर पाणि पीकर कैलास के लिए रवाना हो गई. 


दोपहर की कडी धुप की वजह से ईसरजी और गौरादे पिपल की घनी छाँव मे आराम के लिए रुक गये. बातो बातो मे ईसरजी ने पुछा, "गौरादे आपने क्या खाया?"


गौरादे ने जवाब दिया, "जो आपने खाया वही मैने खाया."


"झुठ मत बोलो." ईसरजी बोले.


गौरादे बोली, "महाराज बेटी जवाई मे कभी फर्क रहता है क्या! आपने जो खाया वही मैने खाया."


बाते करते करते गौरादे को निंद लग गई. मौका देख ईसरजी ने गौरादे के पेट की ढकणी खोल कर देखी तो उसमे आठ फल, गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी और लोटा भर पाणि डळमळ कर रहे थे.


गौरादे जगजाने के बाद ईसरजी बोले, "आपके पेट मे तो आठ फल, गळवाणी, मेथीकी पिंडोळी और लोटा भर पाणि डळमळ कर रहे है. आपने झुठ बोला."


कैसे पता चला ऐसा गौरादे ने पुछा. तब ईसरजी बोले, "मैने आपके पेट की ढकणी खोल कर देखी."


तब गौरादे बोली, "महाराज ये आपने क्या किया. आज आपने देखा कल कोई और देखेगा. पेटमे क्या है यह जानने के बाद बेवजह कलह होंगे और इससे संसार मे अशांती बढेगी."


पहले पेटकी ढकणी खुला करती थी. पर गौरादे की चिंता जानने के बाद ईसरजी ने पेटकी ढकणी को उलटा रख कर हमेशा के लिए बंद कर दिया.


हे ईसरजी मेनादे और गौरादे की जैसी परीक्षा ली, वैसी किसीकी न लेना. घटती की बढती कर दो. अधुरी की पुरी कर दो. सबकी सुख समृद्धी कर दो. सुहाग अमर रख दो. भूल को माफ करदो.


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