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Sunday, 28 March 2021

होली का दस्तूर!!

 

देहरी पर आहट हुई, फागुन पूछे कौन,

मैं बसंत तेरा सखा, तू क्यों अब तक मौन!!

निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल,

इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल!!

कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर ,

वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर!!

फागुन आता देखकर, उपवन हुआ निहाल,

अपने तन पर लेपता, केसर और गुलाल!!

तन हो गया पलाश-सा, मन महुए का फूल,

फिर फगवा की धूम है, फिर रंगों की धूल!!

ढोल मंजीरे बज रहे, उड़े अबीर गुलाल,

रंगों ने ऊधम किया, बहकी सबकी चाल!!

कोयल कूके कान्हड़ा, भँवरे भैरव राग,

गली-गली में गूँजता, एक ताल में फाग!!

रंगों की बारिश हुई, आँधी चली गुलाल,

मन भर होली खेलिए, मन न रहे मलाल!!

उजली-उजली रात में, किसने गाया फाग,

चाँद छुपाता फिर रहा, अपने तन के दाग!!

टेसू पर उसने किया, बंकिम दृष्टि निपात,

लाल लाज से हो गया, वसन हीन था गात!!

अमराई की छांव में, फागुन छेड़े गीत,

बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत!!

फागुन और बसंत मिल, करे हास-परिहास,

उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास!!

पूनम फागुन से मिली, बोली नेह लुटाय,

और माह फीके लगे, तेरा रंग सुहाय!!

नेह-आस-विश्वास से, हुए कलुष सब दूर,

भीगे तन-मन-आत्मा, होली का दस्तूर!!

आतंकी फागुन हुआ, मौसम था मुस्तैद,

आनन-फानन दे दिया, एक वर्ष की क़ैद!!

शुभकामनाएं!!!


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Friday, 25 December 2020

नव वर्ष

यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं ;
है अपना यह त्यौहार नहीं।
है अपनी यह तो रीत नहीं ;
है अपना यह व्यवहार नहीं।।
धरा ठिठुरती है शीत से ;
आकाश में कोहरा गहरा है।
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर ;
सर्द हवाओं का पहरा है।।
सूना है प्रकृति का आँगन ;
कुछ रंग नहीं - उमंग नहीं।
हर कोई है घर में दुबका हुआ ;
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं।।
चंद मास अभी  करो ;
निज मन में तनिक विचार करो।
नये साल नया कुछ हो तो सही ;
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही ?!
ये धुंध कुहासा छंटने 2 ;
रातों का राज्य सिमटने 2 ।
प्रकृति का रूप निखरने 2 ;
फाल्गुन का रंग बिखरने 2 ।।
प्रकृति दुल्हन का रूप धर ;
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी।
शस्य – श्यामला धरती माता ;
घर - घर खुशहाली लायेगी।।
तब चैत्र - शुक्ल  की प्रथम तिथि ;
नव वर्ष मनाया जायेगा।
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर ;
जय - गान सुनाया जायेगा।।

Saturday, 31 October 2020

मिट्टी वाले दीये


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Image Credit: www.jagran.com
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राष्ट्रहित का गला घोंट कर
छेद न करना थाली में।
मिट्टी वाले दीये जलाना 
अबकी बार दीवाली में।
देश के धन को देश में रखना, 
नहीं बहाना नाली में
मिट्टी वाले दीये जलाना 
अबकी बार दीवाली में।
बने जो अपनी मिट्टी से,
वो दीये बिके बाजारों में,
छिपी है वैज्ञानिकता
अपने सभी तीज-त्योहारों में।
चायनीज झालर से आकर्षित
कीट पतंगे आते हैं,
जबकि दीये में जलकर
बरसाती कीड़े मर जाते हैं।
कार्तिक और अमावस वाली, 
रात न सबकी काली हो।
दीये बनाने वालों की अब 
खुशियों भरी दीवाली हो। 
अपने देश का पैसा जाए, 
अपने भाई की झोली में।
गया जो पैसा दुश्मन देश,
तो लगेगा राइफल की गोली में।
देश की सीमा रहे सुरक्षित
चूक न हो रखवाली में।
मिट्टी वाले दीये जलाना
अबकी बार दीवाली में। 

Monday, 1 June 2020

रात

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Image Credit: www.mentalfloss.com
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आज की रात भी बीत जायेगी दिल की नजर फिर तरसती रह जायेगी
कितने ही लम्हे गुजर गए यूँ ही दिल मिले और बिछड़ गए.
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रात आती है तो तडपाती है मुझे,
तेरी खुशबु बैचेन कर जाती है मुझे,
रातो का वो मिलन, दिन की वो मुलाकाते,
आज तेरी चाहत अक्सर रुलाती है मुझे
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होते नही तबादले मोहब्बत करने वालो के
वो आधी रात को भी तन्हाई मे तैनात मिला करते है
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नींद से भरी आँखों की, बिन सोये गुजरी रात हो तुम।।
खतम ना चाह जिसकी ,ऐसी बीती बात हो तुम !
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हो चुकी रात अब सो भी जाइए
जो हैं दिल के करीब उनके ख्यालों में खो जाइए
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अभी तो रात बाकी है, मेरे दिल की बात बाकी है,

जो मेरे दिल में छुपी है, वो ज़ज्बात बाकी है,

जल्दी से सो जाना दोस्तो, आप सब की नींद बाकी है,
सुबह मिलते है, कल की शुरुवात बाकी है…
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रात भर भटका है मन मोहब्बत के पुराने पते पे
चाँद कब सूरज में बदल गया पता नहीं चला
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दिन गुजर जाता हे तुम्हारी यादो के साथ

मसला रात का हे खेर जाने दो
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जिस रात ख्वाब देखा तेरे साथ का हमने
दिल ने चाहा फिर कभी सुबह ना हो
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रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे
उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे
इक विरह की अगन में सुलगते बदन
करवटों में ही मल्हार गाते रहे
टीस, आवारगी, रतजगे, बेबसी
नाम कर मेरे, वो मुस्कुराते रहे
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Thursday, 26 March 2020

उलझन


गम ने हसने न दिया, ज़माने ने रोने न दिया!
इस उलझन ने चैन से जीने न दिया!
थक के जब सितारों से पनाह ली!
नींद आई तो तेरी याद ने सोने न दिया!
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एक उलझन में पड़ा हूं शाम से..
तेरी आँखों से पीयूं या जाम से..??
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उलझन अगर है तो हमसे ना छुपाना,
साथ ना दे ज़ुबान तो आँखो से बताना,
हर कदम पर साथ है हम आपके,
दोस्त बनाया है तो हक़ ज़रूर जताना
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Image Credit: www.poetrytadka.com
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तुम कभी गलतफहमी में रहते हो कभी उलझन में रहते हो.
इतनी जगह दी है तुमको दिल में तुम वहाँ क्यों नहीं रहते हो.
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अजीब उलझन है गालिब!
बीबी कहती है पीना छोडो तुम्हें मेरी कसम,
दोस्त कहते हैं पीना पडेगा साले तूझे भाभी जी की कसम!
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मैं तो बस उलझन में याद करता हूँ और सुलझ जाता हूँ
ए खुदा, धन्य तो वो है जो एक पल भी तुझे भूलते नही
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हिचकी दिला कर कैसी उलझन बड़ा रहे हो
आंखें बंद है फिर भी नजर आ रहे हो
बस इतना सा बता दो हमें याद आ रहे हो या
अपनी याद दिला रहे हो.
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जी कहता जी भर तुझे प्यार करूँ ! 
वक़्त ये कहता क्यूँ तेरा एतबार करूँ 
इसी कश्मकश कहीं तुझे खो ना दूं ! 
दिल ये कहता पहले उलझन पार करूँ 
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स्वस्थ रहो तंदुरुस्त रहो, रहो चुस्त दुरुस्त ।

प्रगति पथ पर हो न पाएं, कदम तुम्हारे सुस्त।।
गर मनोबल ऊँचा है तो, हर उलझन का हल।
शुभकामना यही हमारी, सुख मिले हर पल।।
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अजीब उलझन है मेरी
बढ़ती हुई  उम्र कहती है!
अब सीरियस हुआ जाए!
जबकि खत्म होती उम्र कहती है!
कुछ मस्ती और कार ली जाए!
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Wednesday, 12 June 2019

सरणारे वर्ष मी - मंगेश पाडगांवकर


मी उद्या असणार नाही
असेल कोणी दूसरे
मित्रहो सदैव राहो
चेहरे तुमचे हासरे
झाले असेल चांगले
किंवा काही वाईटही
मी माझे काम केले
नेहमीच असतो राईट मी
माना अथवा नका मानु
तुमची माझी नाळ आहे
भले होओ , बुरे होओ
मी फक्त " काळ " आहे
उपकारही नका मानु
आणि दोषही देऊ नका
निरोप माझा घेताना
गेट पर्यन्त ही येऊ नका
उगवत्याला " नमस्कार "
हीच रीत येथली
विसरु नका ' एक वर्ष '
साथ होती आपली
धुंद असेल जग उद्या
नव वर्षाच्या स्वागताला
तुम्ही मला खुशाल विसरा
दोष माझा प्राक्तनाला
शिव्या ,शाप,लोभ,माया
यातले नको काही
मी माझे काम केले
बाकी दूसरे काही नाही
निघताना " पुन्हा भेटु "
असे मी म्हणनार नाही
" वचन " हे कसे देऊ
जे मी पाळणार नाही
मी कोण ? सांगतो
" शुभ आशीष " देऊ द्या
" सरणारे वर्ष " मी
आता मला जाउ द्या।

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