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Friday, 1 January 2021

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते थे।

 

ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है प्रेम, ब्रह्म का सर्वसार ही प्रेम है श्री कृष्ण राधा रानी के चरण पकड़ते हैं इसे समझने से पहले एक बात समझना जरुरी है कि राधा रानी कौन हैं ?

बहुत थोड़े में समझ लो कि ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

भगवान सत्य संकल्प हैं उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें हम भी भजन करें

अब किसका भजन करें ? उनसे बड़ा कौन है ? तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की ऐसा क्यों किया ? क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में आराधना से प्रगट हो गये इसीलिए ये मान आदि लीला में जो कृष्ण चरण पकड़ते है, एक विशेष प्रेम लीला है राधा रानी को तो छोड़ दो, वो तो उनका ही रूप हैं, उनकी ही आत्मा हैं

भगवान कहते हैं - कि तुम निरपेक्ष हो जाओ तो मैं तुम्हारे भी चरणों के पीछे घूमुंगा कि जिससे तुम्हारी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाये और मैं पवित्र हो जाऊं भगवान तो रसिक हैं जो भक्तों के चरणों की रज के लिये उनके पीछे दौड़ते हैं जब भगवान भक्तों की चरण रज के लिये भक्तों के पीछे दौड़ते हैं तो राधा रानी के चरण पकडें तो इसमें क्या आश्चर्य ?

जब वो श्री जी के चरण छूने जाते हैं तो वो प्रेम से हुंकार करती हैं तो रसिक श्याम डर जाते हैं कि कहीं ऐसा ना हो लाड़ली जी मान कर लें इसीलिए भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं उन चरणों से ही जो सरस रस बिखरा उस रस को पाकर के गोपीजन ही नहीं स्वयं श्री कृष्ण भी धन्य हुए बिहारी जी के प्रकटकर्ता स्वामी हरिदास जी लिखते हैं कि (ता ठाकुर को ठकुराई -----)  वो बोले कि ये मत समझना कि बांके बीहारी जी सर्वोच्चपति हैं सब ठाकुरों के ठाकुर ये बांके बिहारी हैं लेकिन इनकी भी ठकुराइन हैं श्री राधा रानी ।।

जय जय श्री राधे

अब तो प्रेम से बोलो -- राधे राधे

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Tuesday, 27 October 2020

पापांकुशा एकादशी :


पापांकुशा एकादशी :
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति का सभी जाने -अनजाने में किए गए पापों का प्रायश्चित होता है। इस व्रत को करने से मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं। पापाकुंशा एकादशी एक हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है। इस एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति सुवर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते और छाते का दान करता है, उसे यमराज के दर्शन नहीं होते। पापांकुशा एकादशी के दिन गरूड़ पर विराजमान भगवान विष्णु के दिव्य रूप की पूजा की जाती है।

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Image Credit: Jansatta

पापाकुंशा एकादशी की कथा :
प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर एक क्रूर बहेलियां रहता था। उसने अपनी सारी जिंदगी हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और गलत संगति में व्यतीत कर दी। जब उसका अंतिम समय आया तब यमराज के दूत बहेलिये को लेने आए और यमदूत ने बहेलिये से कहा कि कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है हम तुम्हें कल लेने आएंगे। यह बात सुनकर बहेलिया बहुत भयभीत हो गया और महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचा और महर्षि अंगिरा के चरणों पर गिरकर प्रार्थना करने लगा। महर्षि अंगिरा ने बहेलिये से प्रसन्न होकर कहा कि तुम अगले दिन ही आने वाली आश्विन शुक्ल एकादशी का विधि पूर्वक व्रत करना। बहेलिये ने महर्षि अंगिरा के बताए हुए विधान से विधि पूर्वक पापांकुशा एकादशी का व्रत करा और इस व्रत पूजन के बल से भगवान की कृपा से वह विष्णु लोक को गया। जब यमराज के यमदूत ने इस चमत्कार को देखा तो वह बहेलिया को बिना लिए ही यमलोक वापस लौट गए।

Monday, 10 August 2020

Yogmaya- girl who sacrificed herself

No one remembers  the girl baby born on the same day who was interchanged with Krishna, a boy baby, to save his life. The boy's life was precious but the girl was born to sacrifice her life. Today is not only the birthday of Krishna but also of Yogamaya.
It is said that Yogmaya flew off to Heavens freeing herself from the clutches of Kansa while announcing to Kansa that your killer has been born. Scriptures do not clearly  mention that she too got killed like other siblings of Krishna. However more knowledgeable are requested to throw light on it.

Yogmaya was the sister of Lord Krishna Devi who was older to him
Image Credit: www.jagran.com

Yogmaya was also an incarnation of Shakti who came to be born along with the incarnation of Lord Vishnu to keep some old promise. When Kansa caught her by her feet and hurled her to the ground, she flew towards the heaven, saying “Kansa, your killer has already taken birth. I could have also killed you but since you caught me by my feet, I take it as your expression of humility and am pardoning you”.
Krishna was born in the darkness of the night, into the locked confines of a jail.
However, at the moment of his birth, all the guards fell asleep, the chains were broken and the barred doors gently opened.
Similarly, as soon as Krishna ( Chetna, Awareness ) takes birth in our hearts, all darkness ( Negativity ) fades.
All chains ( Ego, I, Me, Myself ) are broken.
And all prison doors we keep ourselves in ( Caste, Religion, Profession, Relations etc )  are opened.
And that is the real Message And Essence of Janmashtmi.
Happy Krishna Janmashtami

Friday, 24 July 2020

शिव


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शिव
शिव ही मीत है। शिव ही प्रीत है।
शिव ही जीवन है। शिव ही प्रकाश है।
शिव ही सांस है। शिव ही आस है।
शिव ही प्यास है। शिव ही ज्ञान है।
शिव ही ससांर है। शिव ही प्यार है।
शिव ही गीत है। शिव ही संगीत है।
शिव ही लहर है। शिव ही भीतर है।
शिव ही बाहर है। शिव ही बहार है।
शिव ही प्राण है। शिव ही जान है।
शिव ही संबल है। शिव ही आलंबन है।
शिव ही दर्पण है। शिव ही धर्म है।
शिव ही कर्म है। शिव ही मर्म है।
शिव ही नर्म है। शिव ही प्राण है।
शिव ही जहान है। शिव ही समाधान है।
शिव ही आराधना है। शिव ही उपासना है।
शिव ही सगुन है। शिव ही निर्गुण है।
शिव ही आदि है। शिव ही अन्त हैै।
शिव ही अनन्त है। शिव ही विलय है।
शिव ही प्रलय है। शिव ही आधि है।
शिव ही व्याधि है। शिव ही समाधि है।
शिव ही जप है। शिव ही तप है।
शिव ही ताप है। शिव ही यज्ञः है।
शिव ही हवन है। शिव ही समिध है।
शिव  ही समिधा है। शिव ही आरती है।
शिव ही भजन है। शिव ही भोजन है।
शिव ही साज है। शिव  ही वाद्य है।
शिव  ही वन्दना है। शिव  ही आलाप है।
शिव ही प्यारा है। शिव  ही न्यारा है।
शिव  ही दुलारा है। शिव ही मनन है।
शिव ही चिंतन है। शिव ही वंदन है।
शिव  ही चन्दन है। शिव ही अभिनन्दन है।
शिव  ही नंदन है। शिव ही गरिमा है।
शिव ही महिमा है। शिव ही चेतना है।
शिव ही भावना है। शिव ही गहना है।
शिव ही पाहुना है। शिव ही अमृत है।
शिव ही खुशबू है। शिव ही मंजिल है।
शिव ही सकल जहाँ है। शिव ही समष्टि है।
शिव ही व्यष्टि है। शिव ही सृष्टी है।
शिव ही सपना है। शिव ही अपना है।।
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Wednesday, 1 July 2020

भगवान के नाम

वृंदावन की एक गोपी रोज दूध दही बेचने मथुरा जाती थी,

एक दिन व्रज में एक संत आये, गोपी भी कथा सुनने गई,

संत कथा में कह रहे थे, भगवान के नाम की बड़ी महिमा है, नाम से बड़े बड़े संकट भी टल जाते है

नाम तो भव सागर से तारने वाला है,

यदि भव सागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोडना

कथा समाप्त हुई गोपी अगले दिन फिर दूध दही बेचने चली,

बीच में यमुना जी थी गोपी को संत की बात याद आई, संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है,

जिस भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है तो क्या उन्ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता ?

ऐसा सोचकर गोपी ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया भोली भाली गोपी यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई

अब जैसे ही यमुना जी में पैर रखा तो लगा मानो जमीन पर चल रही है और ऐसे ही सारी नदी पार कर गई,

पार पहुँचकर बड़ी प्रसन्न हुई, और मन में सोचने लगी कि संत ने तो ये तो बड़ा अच्छा तरीका बताया पार जाने का,

रोज-रोज नाविक को भी पैसे नहीं देने पड़ेगे

एक दिन गोपी ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया मुझे उन्हें खाने पर बुलाना चाहिये,

अगले दिन गोपी जब दही बेचने गई, तब संत से घर में भोजन करने को कहा संत तैयार हो गए,

अब बीच में फिर यमुना नदी आई

संत नाविक को बुलने लगा तो गोपी बोली बाबा नाविक को क्यों बुला रहे है हम ऐसे ही यमुना जी में चलेगे

संत बोले - गोपी ! कैसी बात करती हो, यमुना जी को ऐसे ही कैसे पार करेगे ?

गोपी बोली - बाबा ! आप ने ही तो रास्ता बताया था, आपने कथा में कहा था कि भगवान के नाम का आश्रय लेकर भवसागर से पार हो सकते है

तो मैंने सोचा जब भव सागर से पार हो सकते है तो यमुना जी से पार क्यों नहीं हो सकते ?

और मै ऐसा ही करने लगी, इसलिए मुझे अब नाव की जरुरत नहीं पड़ती

संत को विश्वास नहीं हुआ बोले - गोपी तू ही पहले चल ! मै तुम्हारे पीछे पीछे आता हूँ,

गोपी ने भगवान के नाम का आश्रय लिया और जिस प्रकार रोज जाती थी वैसे ही यमुना जी को पार कर गई

अब जैसे ही संत ने यमुना जी में पैर रखा तो झपाक से पानी में गिर गए, संत को बड़ा आश्चर्य,

अब गोपी ने जब देखा तो कि संत तो पानी में गिर गए है तब गोपी वापस आई है और संत का हाथ पकड़कर जब चली तो संत भी गोपी की भांति ही ऐसे चले जैसे जमीन पर चल रहे हो

संत तो गोपी के चरणों में गिर पड़े, और बोले - कि गोपी तू धन्य है !

वास्तव में तो सही अर्थो में नाम का आश्रय तो तुमने लिया है और मै जिसने नाम की महिमा बताई तो सही पर स्वयं नाम का आश्रय नहीं लिया

सच मे भक्त मित्रो हम भगवान नाम का जप एंव आश्रय तो लेते है पर भगवान नाम मे पूर्ण विश्वाव एंव श्रद्धा नही होने से हम इसका पूर्ण लाभ प्राप्त नही कर पाते

शास्त्र बताते है कि भगवान श्री कृष्ण का एक नाम इतने पापो को मिटा सकता है जितना कि एक पापी व्यक्ति कभी कर भी नही सकता

अतएव भगवान नाम पे पूर्ण श्रद्धा  एंव विश्वास रखकर ह्रदय के अंतकरण से भाव विह्वल होकर जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ के लिए बिलखता है उसी भाव से सदैव नाम प्रभु का सुमिरन एंव जप करे

कलियुग केवल नाम अधारा !

सुमिर सुमिर नर उताराहि ही पारा

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

 

Tuesday, 30 June 2020

सुख दुःख

एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा की प्रभु मैंने पृथ्वी पर देखा है कि जो व्यक्ति पहले से ही अपने प्रारब्ध से दुःखी है आप उसे और ज्यादा दुःख प्रदान करते हैं और जो सुख में है आप उसे दुःख नहीं देते है। भगवान ने इस बात को समझाने के लिए माता पार्वती को धरती पर चलने के लिए कहा और दोनों ने इंसानी रूप में पति-पत्नी का रूप लिया और एक गावं के पास डेरा जमाया । शाम के समय भगवान ने माता पार्वती से कहा की हम मनुष्य रूप में यहां आए है इसलिए यहां के नियमों का पालन करते हुए हमें यहां भोजन करना होगा। इसलिए मैं भोजन कि सामग्री की व्यवस्था करता हूं, तब तक तुम भोजन बनाओ।

 जब भगवान के जाते ही माता पार्वती रसोई में चूल्हे को बनाने के लिए बाहर से ईंटें लेने गईं और गांव में कुछ जर्जर हो चुके मकानों से ईंटें लाकर चूल्हा तैयार कर दिया। चूल्हा तैयार होते ही भगवान वहां पर बिना कुछ लाए ही प्रकट हो गए। माता पार्वती ने उनसे कहा आप तो कुछ लेकर नहीं आए, भोजन कैसे बनेगा। भगवान बोले - पार्वती अब तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। पहले ये बताओ कि तुम चूल्हा बनाने के लिए इन ईटों को कहां से लेकर आई तो माता पार्वती ने कहा - प्रभु इस गांव में बहुत से ऐसे घर भी हैं जिनका रख रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा है। उनकी जर्जर हो चुकी दीवारों से मैं ईंटें निकाल कर ले आई। भगवान ने फिर कहा - जो घर पहले से ख़राब थे तुमने उन्हें और खराब कर दिया। तुम ईंटें उन सही घरों की दीवार से भी तो ला सकती थीं। माता पार्वती बोली - प्रभु उन घरों में रहने वाले लोगों ने उनका रख रखाव बहुत सही तरीके से किया है और वो घर सुंदर भी लग रहे हैं।

ऐसे में उनकी सुंदरता को बिगाड़ना उचित नहीं होता। भगवान बोले - पार्वती यही तुम्हारे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर है। जिन लोगो ने अपने घर का रख रखाव अच्छी तरह से किया है यानि सही कर्मों से अपने जीवन को सुंदर बना रखा है उन लोगों को दुःख कैसे हो सकता है। मनुष्य के जीवन में जो भी सुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा सुखी है, और जो दुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा दुखी है । इसलिए हर एक मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे ही कर्म करने चाहिए जिससे इतनी मजबूत व खूबसूरत इमारत खड़ी हो कि कभी भी कोई उसकी एक ईंट भी निकालने न पाए।

प्रिय मित्रों, यह संकल्प लें कि हमें इस जीवन को सत्कर्मों से इतना खूबसूरत बनाना है कि ईश्वर भी उससे छेड़छाड़ नहीं करे। जीवन में हमेशा सही रास्ते का ही चयन करें और उसी पर चलें ।

राम राम जी


Wednesday, 25 March 2020

भारतीय नववर्ष


प्रकृति - 1 जनवरी कोई अंतर नही जैसा दिसम्बर वैसी जनवरी। चैत्र मास में चारो तरफ फूल खिल जाते हैं, पेड़ो पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो तरफ हरियाली मानो प्रकृति नया साल मना रही हो।
वस्त्र - दिसम्बर और जनवरी में वही उनी वस्त्र। कंबल रजाई ठिठुरते हाथ पैर चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है , गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है ।
विद्यालयो का नया - दिसंबर जनवरी वही कक्षा कुछ नया नही। जबकि मार्च अप्रैल में स्कूलो का रिजल्ट आता है नई कक्षा नया सत्र यानि विद्यालयों में नया साल।
नया वित्तीय वर्ष- दिसम्बर जनबरी में कोई खातो की क्लोजिंग नही होती। जबकि 31 मार्च को बैंको की(audit) कलोसिंग होती है नए वही खाते खोले जाते है। सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है।
कलैण्डर-जनवरी में नया कलैण्डर आता है। चैत्र में नया पंचांग आता है उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं । इसके बिना हिन्दू समाज जीवन की कल्पना भी नही कर सकता इतना महत्व पूर्ण है ये कैलेंडर यानि पंचांग।
किसानो का नया साल -  दिसंबर जनवरी में खेतो में वही फसल होती है , जबकि मार्च अप्रैल में फसल कटती है नया अनाज घर में आता है तो किसानो की वार्षिक योजना बनती है।
पर्व मनाने की विधि -  31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर मदिरा पान करते है, हंगामा करते है ,रात को पीकर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी बारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल,और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश 
जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होता है पहला नवरात्र होता है घर घर मे माता रानी की पूजा होती है। शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।
ऐतिहासिक महत्त्व - 1 जनवरी का कोई ऐतेहासिक महत्व नही है,  जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत  भगवान झूलेलाल का जन्म नवरात्रे प्रारंम्भ,  ब्रहम्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना, इत्यादि का संबंध इस दिन से है।
अंग्रेजी कलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगो के अलावा कुछ नही बदला
अपना नव संवत् ही नया साल है।
जब ब्रह्माण्ड से लेकर
सूर्य चाँद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है। जो विज्ञान आधारित है।
तब अपनी मानसिकता को बदले। विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने।
स्वयं सोचे की क्यों मनाये हम 1 जनवरी को नया वर्ष केवल कैलेंडर बदलें। अपनी संस्कृति नही।
आओ जगे जगाये, भारतीय संस्कृति अपनाये, आधुनिक बने ।

Thursday, 17 October 2019

घास का तिनका

रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो को
सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की।

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Image credit: Exotic India

रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ। रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा, "आप  तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ?"
रावण बोला, "जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ।"
रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता !

रावण एक बार फिर आया और बोला, "मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?" रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।

इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया।

प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर पर मिठास बनी रहे। इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों  सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।

माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर स सब देख रही थी।

ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'। लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।

फिर उन्होंने सीताजी जे कहा, "मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था । आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना। आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।"

इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।

तृण धर ओट कहत वैदेही
सुमिरि अवधपति परम् सनेही

इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही ! ऐसी विशलहृदया थीं हमारी जानकी माता ।

Tuesday, 15 January 2019

तेल से भरा बर्तन

नारद मुनि जहां भी जाते थे, बस ‘नारायण, नारायण’ कहते रहते थे। नारद को तीनों लोकों में जाने की छूट थी। वह आराम से कहीं भी आ-जा सकते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक किसान परमानंद की अवस्था में अपनी जमीन जोत रहा था। नारद को यह जानने की उत्सुकता हुई कि उसके आनंद का राज क्या है। जब वह उस किसान से बात करने पहुंचे, तो वह अपनी जमीन को जोतने में इतना डूबा हुआ था, कि उसने नारद पर ध्यान भी नहीं दिया। दोपहर के समय, उसने काम से थोड़ा विराम लिया और खाना खाने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा। उसने बर्तन को खोला, जिसमें थोड़ा सा भोजन था। उसने सिर्फ ‘नारायण, नारायण, नारायण’ कहा और खाने लगा। आप जिस पल जीवन के एक आयाम से दूसरे आयाम में जाते हैं उस समय अगर आप सिर्फ अपनी जागरूकता कायम रख पाएं, तो आपको मुक्ति मिल सकती है। किसान अपना खाना उनके साथ बांटना चाहता था मगर जाति व्यवस्था के कारण नारद उसके साथ नहीं खा सकते थे। नारद ने पूछा, ‘तुम्हारे इस आनंद की वजह क्या है?’ किसान बोला, ‘हर दिन नारायण अपने असली रूप में मेरे सामने आते हैं। मेरे आनंद का बस यही कारण है।’ नारद ने उससे पूछा, ‘तुम कौन सी साधना करते हो?’ किसान बोला, ‘मुझे कुछ नहीं आता। मैं एक अज्ञानी, अनपढ़ आदमी हूं। बस सुबह उठने के बाद मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम शुरू करते समय मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम खत्म करने के बाद मैं फिर तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। जब मैं खाता हूं, तो तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं और जब सोने जाता हूं, तो भी तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं।’ नारद ने गिना कि वह खुद 24 घंटे में कितनी बार ‘नारायण’ बोलते हैं। वह लाखों बार ऐसा करते थे। मगर फिर भी उन्हें नारायण से मिलने के लिए वैकुण्ठ तक जाना पड़ता था, जो बहुत ही दूर था। मगर खाने, हल चलाने या बाकी कामों से पहले सिर्फ तीन बार ‘नारायण’ बोलने वाले इस किसान के सामने नारायण वहीं प्रकट हो जाते थे। नारद को लगा कि यह ठीक नहीं है, इसमें जरूर कहीं कोई त्रुटि है। वह तुरंत वैकुण्ठ पहुंच गए और उन्होंने विष्णु से पुछा, ‘मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूं, मगर आप मेरे सामने नहीं प्रकट नहीं होते। मुझे आकर आपके दर्शन करने पड़ते हैं। मगर उस किसान के सामने आप रोज प्रकट होते हैं और वह परमानंद में जीवन बिता रहा है!’ विष्णु ने नारद की ओर देखा और लक्ष्मी को तेल से लबालब भरा हुआ एक बर्तन लाने को कहा। उन्होंने नारद से कहा, ‘पहले आपको एक काम करना पड़ेगा। तेल से भरे इस बर्तन को भूलोक ले जाइए। मगर इसमें से एक बूंद भी तेल छलकना नहीं चाहिए। इसे वहां छोड़कर आइए, फिर हम इस प्रश्न का जवाब देंगे।’ नारद तेल से भरा बर्तन ले कर भूलोक गए, उसे वहां छोड़ कर वापस आ गए और बोले, ‘अब मेरे प्रश्न का जवाब दीजिए।’ विष्णु ने पूछा, ‘जब आप तेल से भरा यह बर्तन लेकर जा रहे थे, तो आपने कितनी बार नारायण बोला?’ नारद बोले, ‘उस समय मैं नारायण कैसे बोल सकता था? आपने कहा था कि एक बूंद तेल भी नहीं गिरना चाहिए, इसलिए मुझे पूरा ध्यान उस पर देना पड़ा। मगर वापस आते समय मैंने बहुत बार ‘नारायण’ कहा।’ विष्णु बोले, ‘यही आपके प्रश्न का जवाब है। उस किसान का जीवन तेल से भरा बर्तन ढोने जैसा है जो किसी भी पल छलक सकता है। उसे अपनी जीविका कमानी पड़ती है, उसे बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं। मगर उसके बावजूद, वह नारायण बोलता है। जब आप इस बर्तन में तेल लेकर जा रहे थे, तो आपने एक बार भी नारायण नहीं कहा। यानी यह आसान तब होता है जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता।’
नारायण नारायण नारायण !
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Monday, 14 January 2019

झूठा गुड़

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था। एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना.. लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।
उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था, हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी, और उसमें से एक वृद्ध उतरे, अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।
वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये, पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था, अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया, सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मां बाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।
कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई, इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता, हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे, मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।
मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला “अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड क्यों खाया?”
उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले “ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता। जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।
“मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ?”
वे बोले “ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी। तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था, मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये। मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश  में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया। शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय। कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया। और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया। इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई, मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था, मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा, और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया, शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ, मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।“
मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, “समझ गये अब तो तुम,” मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े, गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।
सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था। उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी। घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि., गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं। इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं। ऋग्वेद में गौ को ‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।
।। जय गौ माता।।
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