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Sunday, 20 August 2017

अजमल घर अवतार


लीले घोड़े रा असवार। लीनो अजमल घर अवतार।।
रानी नेतल रा भरतार। बाबा म्हारे घर आओ जी।।
हो बाबा म्हारे घर आओ जी।।टेर।।

काना में थारे कुंडल सोहे। गले फूलों की माला।।
सिर पर थारे मुकुट विराजे। नैन लगे मतवाले।।
शोभा बरनी न जाए। बेठया मन हरषाए।।
हो बाबा म्हारे घर आओ जी।।1।

रुणिचो थारो धाम कहावे। आवे नर और नारी।।
सूरज सामो बनियों देवरो। मेड़ा की छवि न्यारी।।
थारी देखी मारवाड़। थाने पूछे हैं बराड़।।
हो बाबा म्हारे घर आओ जी।।2।।

कृपा दृष्टि के दाता थे हो। कलजुग रा अवतारी।।
जगमग ज्योति रामधनी री। हाथ में भाला धारी ।।
थारा चर्चा अपारच। जाने सारा संसार।।
हो बाबा म्हारे घर आओ जी।।3।।

अंधळियाने अख्या देवे। पांगळिया ने पावजी।।
कोढीयारों कोढ़ मिटावे। रामदेवरो नावजी ।।
थे रुणिचा नरेश। काटो भक्तारा कलेश।।
हो बाबा म्हारे घर आओ जी।।4।।

जय जय रामदेव बाबा। जय बाबा री।
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शनि प्रदोष व्रत कथा

प्राचीन समय में मगध के किसी नगर में एक सेठ रहते थे धनीराम। वह धर्म कर्म का पालन करने वाले तथा दान पुन्य़ करने वाले व्यक्ति थे। 
सभी उसका सम्मान किया करते थे सब कुछ होने के बावजूद वह दुखी ही रहता थे क्योंकि उसके कोई संतान नहीं थी। 
अपनी व्यथा से परेशान दोनो पति -पत्नी तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय करते हैं। इस यात्रा के दौरान उनकी भेंट तपस्वी साधू से होती है। 
सेठ की भक्ति से प्रभावित हो साधु संतान प्राप्ति हेतु उन्हें शनि प्रदोष व्रत के विषय में बताते हैं। 
तीर्थयात्रा के बाद पति-पत्नी वापस घर लौट कर नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करते हैं व्रत के फल स्वरुप सेठ दंपति को संतान की प्राप्ति होती है। 

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Saturday, 19 August 2017

ऊँची चढुला साहेबा

ऊँची चढुला साहेबा नीची उतरुला 
देखूँ म्हारो जामण जायो आवतो 
काकाजी आया, म्हारा बाबाजी आया 
जलहर जामी बाबुल नहीं आया
थाने ये गोरी म्हारी अगड़ घडाय दूँ 
थारा बाबूलरी कर मानजो
थे ही मानोला साहेबा लोग न मान 
नैन झुरता लोभी नहीं आयो 
काकीजी आई म्हारी बडियाजीं आई 
राता तो देई मायड नहीं आई
थाने ये गोरी म्हारी गोखरु उडाय दूं  
थारा मायज रा कार मान लो
थे तो मनोला साहेबा लोग न माने 
नैन झुरता लोभी नहीं आयो 
काकारा आया म्हारा बीस नहीं आया 
जामनरा जाया बीरा नहीं आया
थाने ये गोरी म्हारी चूंदड़ ओढाय दूँ 
थारा तीरा री कर मान लो
थेई मानोला साहेबा लोग न माने 
नैन झुरता लोभी नही आयो 
काकीरी आईं म्हारं बडियारी आई 
जामनरी जाई बहनड़ नही आई 
थाने ये गोरी म्हारी शालू मंगाय दूँ 
थारा बहनड़ री कर मानलो 
थे ही मानलो साहेबा लोग न माने 
नैन झुरता लोभी नहीं आयो

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Friday, 18 August 2017

चलो भादवा आया है

(तर्ज चलो बुलावा आया है)

चलो भादवा आया है। बाबा ने बुलाया है।
ऊंचे पर्वतकी रेती में। यह दरबार लगाया है।
चलो भादवा आया है।। टेर।।

सारे जग मे परचाधारी। देखो दुखड़े वालोंका।
राह देखता हैं वो बाबा। अंधे लूले लंगडो का।
जगमग जोत जले बाबा। की जिसने दर्शन पाया है।
चलो भादवा आया है ।।1।।

जय बाबा की कहते जाओ। सारे नर और नारी को।
प्रेम भावसे पूजा जिसने। कलजुग परचाधारी को।
जो जैसा भी शरण आए। उसने चैनहीं पाया है।
चलो भादवा आया है ।।2।।

रामदेव के इस मंदिर में। परचा हरदम होता है।
जिसकी जैसी रहे भावना। वैसा ही वह पाता है।
निर्भयता से जो कोई मांगे। उसका दुख भी मिट जाता है।
चलो भादवा आया है ।।3।।

मैं भी तो एक दुखिया बाबा। दुखिया का दूख तू जाने।
सुख की झोली भर देना अब। तेरे बिना कोई ना जाने।
बाबा के ममता को देखो। भक्तोंने गुण गाया है।
चलो व भादवा आया है ।।4।।

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Thursday, 17 August 2017

जब रामकृष्ण परमहंस की पीठ पर दिखे डंडे की मार के निशान

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के पास स्थित किसी गांव में भजन के लिए जा रहे थे। वह गांव दूर था, इसलिए बैलगाड़ी में बैठकर जा रहे थे। तब परमहंस की ख्याति ज्यादा नहीं फैली थी। लोग उन्हें काली मंदिर के पुजारी या ज्यादा से ज्यादा एक मामूली संत ही समझते थे।


रास्ता लम्बा था तो परमहंस के मन में एक प्रेरणा उठी और वह श्रीकृष्ण चरित सुनाने लगे। जहां जाना था, वह जगह काफी दूर थी, इसलिए गाड़ीवन का मन भी कथा में लगने लगा। उसे इतना रस आया कि कथा सुनने में ही रम गया।

गाड़ीवान का ध्यान बैलों की ओर तब गया, जब वे धीमे चलने लगे थे। बैलों की गति देखकर गाड़ीवान को गुस्सा आ गया और उसने एक बैल की पीठ पर जोर-जोर से दो चार डंडे जमा दिए। जैसे ही गाड़ीवान ने बैल की पीठ पर डंडे मारे, गाड़ी मे बैठे हुए रामकृष्ण परमहंस अपनी जगह से अचानक नीचे गिर पड़े और कराहने लगे। परमहंस की अचानक हुई इस हालत को देखकर गाड़ीवान आश्चर्य और घबराहट से भर गया।

उसने गाड़ी रोकी और दौड़कर रामकृष्ण के पास पहुंचा। उन्हें गौर से देखा, तो पता चला की बैल को मारे गए डंडों की चोट के निशान परमहंस की पीठ पर भी बन गए हैं। गाड़ीवान का ध्यान गया कि परमहंस एकटक उस बैल को ही देखे जा रहे थे।

सभी को अपना ही रूप मानने की बातें, तो गाड़ीवान ने कई बार सुनी थी, लेकिन उसका जीता-जागता प्रमाण पहली बार दिखाई दिया था।

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Tuesday, 15 August 2017

बधाओ (आशीषडी) – बनीकी शादीका



दोय डूंगरा बीच बेल पसरी,
बीरा रे आँगना आम्बो मोलीयो।
थे तो सुण सुणजी म्हारा सुगनाजी सायब,
नणंद पड़ोसन मती राख जो,
ब तो सोधन देख, यो सायबा सोधन मांग,
उठ सवार म्हासु कळकर,
बे तो थांका बेठनरा सायब घुड़लाजी मांग,
म्हारा ओढनरी बाला चुन्दडी।
तू तो गेली ए गोरी बोलण जाण, बोलर हुई अनखावळी।
म्हारा ओढ़नरी बेरंग चुन्दडी
म्हे तो आमाजी सामा मेल चिनावाँ,
जाँ बीच राखा बाईरा ओबरा।
म तो म्हारा गुंडलाजीदेशा
थारा ओढनकी बाला चुन्दडी।
म्हे तो केळीजी मोडर दातण बेठू,
झारी भर ल्याव म्हारा भानजा।
म तो डाळ रांधू भातरांधू,
करू ये मांगडयरो रायतो।
म्हे तो जीमण बेठर हेलोजी मारू,
आय परोस म्हारी बेनड़ी।
ए तो ऐवड़ छेवड़ म्हारा भाइरे भतीजा,
आधबीच सोव म्हारा भानजा।
भानजान देख्या म्हारो कँवल हुलसे।
भतीज्याँन देख्या म्हारो मन हँसे।
थे तो धन धन जी भवरीलाल* जी रा छावा,
बेंनारो मान बडो क-यो।
ब तो दुकाना बेठ्या बायीरा बिराजी बोल्या,
देवो म्हारी बेन आशीषडी थे,
थे तो बदजो ओ बीरा बडरे पीपल जूं।
फलज्योजी नारेळारा रुख जू।
ब तो झीणस घुँघट बाइरी भावज बोली,
देवो म्हारी ननंद आशिसडी
थे तो सात ए भावज पूत जण जो
ज्याबीच जण जो सुगणी धीयड़ी।
थारा धियाल्यान परदेश दीजो।
जूँ चित आवे भोळी ननूँदली।
म तो हार पोयर खुटयाजी मेल्यो
जा बाई सुनिता** थारे सासर।
* भवरीलाल कि जगह बनी के पिताजी का नाम लेना।
** सुनिता कि जगह बनी का नाम लेना।
ये गीत भुवा के मन कि बात दर्शाता है।

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Friday, 4 August 2017

वडिलांनी मुलाला पत्र









नक्की वाचा आणि पटलं तर आपल्या वयात येणाऱ्या मुलांनाही वाचायला द्या. फक्त एकदा नाही तर पुन्हा पुन्हा वाचा आणि पुन्हा पुन्हा वाचायला सांगा.....पुन्हा पुन्हा एवढ्यासाठी कि ज्यावेळी जसा मूड असेल तसा प्रत्येक वेळी वेगळा अर्थ समजून येईल.



"माझ्या लाडक्या मुला.मी हे असं तुला पत्र लिहितोय बघ, वाच, आणि ठरव....



जगणं, नशीब आणि अपघात या तीन गोष्टी कधी घडतील-बिघडतील सांगता येत नाही. सगळंच अर्त्यक्य आपण अमुक इतके दिवस जगू हे कुणी सांगू नाही शकत. त्यामुळे काही गोष्टी वेळेवर बोललेल्या बऱ्या.

    

मी बाप आहे तुझा, मी तुला जे सांगेन ते इतर कुणी कदाचित कधीच नाही सांगणार.

  

मी माझ्या आयुष्यात ज्या चुका केल्या त्या तुला टाळता आल्या तर तुझे कष्ट, जिवाचे चटके आणि मनाचा त्रास बराच कमी होईल, म्हणून काही गोष्टी तुला सांगतोय.

  

माणसांविषयी मनात आकस ठेवू नको, कुणाचा द्वेष करू नकोस. तुझ्याशी कायम चांगलंच वागलं पाहिजे अशी इतर लोकांवर काही आपण सक्ती नाही करू शकत. त्यामुळे ते असंच का वागतात असं म्हणून तणतणू नको. तुझ्याशी कायम चांगलं वागण्याची जबाबदारी फक्त माझी आणि तुझ्या आईचीच आहे. तेव्हा जी माणसं तुझ्याशी चांगलं वागतात, त्यांच्याशी चांगलं वाग. पण हे कायम लक्षात ठेव की प्रत्येक माणूस प्रत्येक गोष्ट कुठल्या ना कुठल्या हेतूपोटी करतो. त्यामुळे जी माणसं गोड बोलतात, तुझ्याशी कायम चांगलीच वागतात त्यांना तू खरंच आवडतो असं काही नसेलही. जरा माणसं तपासून बघ, पटकन मित्र बनवून पूर्ण विश्वास टाकण्याची घाई करू नकोस.



जगणं कशानेच कुणामुळेच थांबत नाही. त्यामुळे माणसं तुला सोडून जातील. नाकारतील, झिडकारतील किंवा ज्यांच्यावर तू जीव तोडून प्रेम केलंस तेच तुझ्या आयुष्यातून निघून जातील. तेव्हा हेच कायम लक्षात ठेव की, कुठल्याही माणसामुळे आपलं जगणं थांबत नाही. कधीच नाही.



आयुष्य फार छोटं आहे आणि तीच तुझी खरी पुंजी आहे. त्यामुळे आज वाया घालवलास तर उद्या कदाचित जगणंच तुला सोडून जाईल. त्यापेक्षा आज मनापासून, भरभरून जग. आनंदी राहा.



प्रेम ही एक क्षणिक आणि चंचल भावना आहे. ती काळाप्रमाणे आणि मूडप्रमाणोही बदलते. ज्यांच्यावर तू जिवापाड प्रेम करतोस तेच समजा तुला सोडून गेले तर जरा धीर धर. काळाच्या मलमानं या जखमाही भरून निघतील. प्रेमात पडलास म्हणजे तेच सगळ्यात सुंदर आणि अतीव चांगलं असं समजू नकोस आणि प्रेमभंग झाला म्हणून त्या दु:खालाही जास्त कवटाळून बसू नकोस.



अनेक यशस्वी माणसांनी शिक्षण अर्धवट सोडलं, तरी ते यशस्वी झाले अशा कहाण्या तू वाचल्या असशीलच ! पण याचा अर्थ असा नाही की, एक शिक्षण सोडलं की तूही यशस्वी होशील. नॉलेज, ज्ञान हे एक शस्त्र आहे हे लक्षात ठेव. शून्यातून स्वर्ग निर्माण करता येतो हे खरंय, पण कुठल्या तरी शून्यापासून आधी सुरुवात तर करायला लागतेच ना.



माझी अपेक्षाच नाही की मी म्हातारा झाल्यावर तू मला सांभाळावंसं. मीही तुला जन्मभर पोसणार नाहीच. तू स्वत:च्या पायावर उभा राहू शकशील तोर्पयत तुला सपोर्ट करणं ही माझी जबाबदारी. त्यानंतर तुला बसमधून फिरायचं की लिमोझीनमधून , गरीबच राहायचं की श्रीमंत व्हायचं हा निर्णय तुझा तू घ्यायचा.



आणखी एक, मीही अनेकदा लॉटरीचं तिकीट काढलं, ते कधीच लागलं नाही. एका रात्रीत श्रीमंत होता येत नाही. श्रीमंत व्हायचं तर मेहनत करावीच लागते. जगात फुकट कधीच काहीच मिळत नाही.



- तुझा बाबा


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