राधाजी:- गुस्सा क्या है?
कृष्णजी:- किसीकी गलती की सजा खुद को देना।
राधाजी:- दोस्त और प्यारमे क्या फर्क है।
कृष्णजी: - प्यार सोना है और दोस्त हिरा। सोना टूट कर दुबारा बन सकता है मगर हिरा नहीं।
राधाजी: - मैं कहा कहा हु ?
कृष्णजी: - तुम मेरे दिल में, सास में, जिगर में, धड़कन में, तन में मन में हर जगह हो।
राधाजी: - मैं कहा नहीं हु?
कृष्णजी: - मेरी किस्मत में।
राधाजी: - प्यार का असली मतलब क्या है?
कृष्णजी: - जहां मतलब होता है वहां प्यार कहा होता है।
राधाजी: - आपने मुझसे प्रेम किया लेकिन विवाह रुक्मिणी से किया। ऐसा क्यु?
कृष्णजी: - विवाह के लिए दो लोग चाहिए, और हम तो एक है।
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