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Sunday, 8 October 2017

श्रीगणेश संकीर्तन – 2


वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः

गणेश शरणम शरणम गणेशा 
सिद्धि विनायक शरणम गणेशा
बुद्धि  प्रदायक शरणम गणेशा
गणेश शरणम शरणम गणेशा
मंगल मूर्ति शरणम गणेशा
लंबोदर हे शरणम गणेशा

गणेश शरणम शरणम गणेशा

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Thanks for reading till the end.

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Monday, 2 October 2017

भाषा

*🙏🏼🙏🏼शठे शाठ्यम समाचरेत🙏🏼🙏*
          
*सन 711ई.* की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद  एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।
एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और  बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।
आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।
                                25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला---
*महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।*

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।"

*"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"*

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले-
"किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। "

तक्षक ने कहा-
*"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"*

"पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर"

"राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।"

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।

अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था....

उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"

*इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।*
*तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा।*
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼
*विनम्र निवेदन*
यह पोस्ट आपके 👌🏽👌🏽✌🏽✌🏽👍🏽👍🏽 की मोहताज नही है। भारत के इतिहास की यह गौरवशाली कथा उच्च कोटि की ही है।
बस आपसे इतना विनम्र निवेदन है कि
पसन्द आये तो forward अवश्य करें
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

शांति

😊
((((((((  भीतर की आवाज  ))))))))
,
एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसे तो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस पाना चाहता था.
.
उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास किया, कभी कमरे में खोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में …. पर तामाम कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली.
.
उसने निश्चय किया की वो इस काम में बच्चों की मदद लेगा और उसने आवाज लगाई , ”
.
सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई भी मेरी खोई घडी खोज देगा उसे मैं १०० रुपये इनाम में दूंगा.”
.
फिर क्या था , सभी बच्चे जोर-शोर से इस काम में लग गए… वे हर जगह की ख़ाक छानने लगे , ऊपर-नीचे , बाहर, आँगन में ..हर जगह… पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं मिली.
.
अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे और किसान को भी यही लगा की घड़ी नहीं मिलेगी,
.
तभी एक लड़का उसके पास आया और बोला , ”
.
काका मुझे एक मौका और दीजिये, पर इस बार मैं ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.”
.
किसान का क्या जा रहा था, उसे तो घडी चाहिए थी, उसने तुरंत हाँ कर दी.
.
लड़का एक-एक कर के घर के कमरों में जाने लगा… और जब वह किसान के शयन कक्ष से निकला तो घड़ी उसके हाथ में थी.
.
किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया और अचरज से पूछा
.
बेटा, कहाँ थी ये घड़ी , और जहाँ हम सभी असफल हो गए तुमने इसे कैसे ढूंढ निकाला ?”
.
लड़का बोला,” काका मैंने कुछ नहीं किया बस मैं कमरे में गया और चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की आवाज़ पर ध्यान केन्द्रित करने लगा ,
.
कमरे में शांति होने के कारण मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे गयी , जिससे मैंने उसकी दिशा का अंदाजा लगा लिया और आलमारी के पीछे गिरी ये घड़ी खोज निकाली.”
****
मित्रो, जिस तरह कमरे की शांति घड़ी ढूढने में मददगार साबित हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें जीवन की ज़रूरी चीजें समझने में मददगार होती है.
.
हर दिन हमें अपने लिए थोडा वक़्त निकालना चाहिए , जिसमे हम बिलकुल अकेले हों , जिसमे हम शांति से बैठ कर खुद से बात कर सकें और अपने भीतर की आवाज़ को सुन सकें , तभी हम जिंदगी को और अच्छे ढंग से जी पायेंगे.
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फुल स्टॉप !

अप्रतिम लेख ....
.....परत परत वाचा 
नक्की वाचा......

Be the CEO of your own Life ...

बघा फरक पडेल आपल्या आयुष्यात...
👌👌👌👌👌👌

प्रत्येकाने वाचावा असा अप्रतिम लेख...

दोन दिवसांपूर्वीची गोष्ट..
कुटुंबासह कुठल्यातरी मॉलमध्ये होतो.
मुलगा ‘प्ले झोन’ मध्ये, सौ. (विन्डो) शॉपिंगमध्ये आणि मी एसी ची छान गार हवा अंगावर घेत एका कोपऱ्यात पेपर वाचत बसलो होतो.
पेपर खरं तर, नांवाला.
माणसं वाचत बसलो होतो.
विविध चेहऱ्यांची, आकारांची
माणसं जणू ‘आज जगाचा शेवटचा दिवस असावा’ असे भाव आणून शॉपिंग करत होती.
(एवढ्या वस्तू विकत घेऊन माणसं त्या वस्तू घरात कुठे ठेवतात, हा मध्यमवर्गीय प्रश्न मला कायम सतावतो. असो.)

माझं ‘माणसं-वाचन’ चालू असतानाच माझ्या शेजारी एक तरुण येऊन बसला.
जेमतेम चाळीशीचा असावा.
जीन्स आणि खोचलेला टी शर्ट. पायात बूट.
अंगावर ब्रुट.
हातात मराठी पुस्तक.
खिशातला शुभ्र रुमाल काढून त्याने कपाळावरचा घाम पुसला.
रुमालाची (होती तशी) व्यवस्थित घडी घातली आणि (त्याच) खिशात ठेवली. त्याच्या हालचाली शांत झाल्यावर त्याने पुस्तक उघडले.  ते पुस्तक माझ्या आवडत्यांपैकी एक होतं.
न राहवून मी म्हटलं, ‘मस्त पुस्तक आहे.’ त्याने माझ्याकडे बघत हसून मान हलवली..

पाच एक मिनिटांनी तो माझ्याकडे वळून म्हणाला, ’वाचन आवडतं?’

‘प्रचंड. रीडिंग इज माय ‘फर्स्ट लव्ह’.
’आजूबाजूला ‘सौ’ नाही हे बघत मी म्हटलं.

‘किती वाचता रोज?’
‘रोज असं नाही…अं.. अं…काही खास ठरवलेलं नाही.
इच्छा झाली की वाचतो.’
अनपेक्षित योर्करला कसंबसं खेळत मी म्हटलं.

‘खायला आवडतं?’
कॉन्जीक्युटीव्ह योर्कर.

‘प्रचंड. इटिंग इज माय ‘सेकंड लव्ह’.’

‘हो?  मग रोज जेवता की इच्छा होईल तेव्हा….?’

‘नाही नाही…रोज दोन वेळा..
आणि मधे-मधे काहीना काही खादाडी चालू असतेच..
’हिट विकेट !

तो तरुण हसला. म्हणाला, ‘मी दिवसभरात एक तास वाचतो. वाचल्याशिवाय झोपत नाही. आंघोळ, जेवण.. तसंच वाचन !’

‘बरा वेळ मिळतो तुम्हाला.’
दयनीय चेहरा करत मी म्हटलं..

‘वेळ मिळत नाही. मी काढतो.
‘वेळ’ ही जगातली सगळ्यात ‘टेकन फॉर ग्रान्टेड’ गोष्ट आहे असं मी मानतो..

फॉर दॅट मॅटर, आयुष्यच घ्या ना !
फारच गृहीत धरतो आपण आयुष्याला !
‘मी रिटायर झाल्यावर भरपूर वाचन करणार आहे' असं कोणी म्हटलं नां! की माझी खात्री होते, नवज्योत सिंग सिद्धूसारखा रेड्यावर हात आपटत तो ‘यम’ त्याला हंसत असेल !’

मी हसलो. तसा किंचित गंभीर होत त्याने विचारलं, ‘तुम्ही कधी पाहिलंय यमाला?’

मी आणखी हसू लागलो. ‘आय ऍम प्रीटी सिरीयस.. तुम्ही पाहिलंय यमाला ?

हो, मी पाहिलंय. दोन वर्षांपूर्वी.
रस्ता क्रॉस करत होतो. समोरून भरधाव गाडी आली. त्या दिव्यांच्या प्रकाश झोतातही मी अंधार पाहिला. त्या दोन सेकंदात मला ‘मृत्यूने’ दर्शन दिलं. त्यानंतर जागा झालो तो हॉस्पिटलमध्येच.
गंभीर इजा होऊन सुद्धा मी कसाबसा वाचलो होतो..

हॉस्पिटलमधून घरी आलो तो नवा जन्म घेऊन..
मी ‘देव’ पाहिला नव्हता पण ‘मृत्यू’ पाहिला होता. मृत्यू तुम्हाला खूप शिकवतो.

माझी मृत्यूवर श्रद्धा जडली. आजूबाजूला रोज इतके मृत्यू दिसत असूनही ‘मी’ अमर राहणार असं ज्याला वाटतं, तो माणूस !

तुम्हाला माहितीय, माणूस मृत्यूला का घाबरतो?’

‘अर्थात ! मृत्यूनंतर त्याचे सगे सोयरे कायमचे दुरावतात..
मृत्यूमुळे माणसाच्या इच्छा अपूर्ण राहतात.’ मी म्हटलं..

‘साफ चूक' !  माणूस यासाठी घाबरतो कारण मृत्यूनंतर ‘उद्या’ नसतो !’

‘मी समजलो नाही.’

‘प्रत्येक काम आपल्याला ‘उद्यावर’ टाकायची संवय असते..
वाचन, व्यायाम, संगीत ऐकणे…
गंमत म्हणजे, आहेत ते पैसे देखील आपण ‘आज’ उपभोगत नाही..
ते कुठेतरी गुंतवतो.....  भविष्यात ‘डबल’ होऊन येतील म्हणून !

या ‘उद्या’ वर आपला फार भरवसा असतो..
मग तो आपल्या जगण्याचा एक भाग बनतो..

आपण मृत्यूला घाबरतो कारण मृत्यू तुम्हाला हा ‘उद्या’ बघायची संधी देत नाही !

मृत्यू म्हणजे – आहोत तिथे,
आहोत त्या क्षणी फुल स्टॉप !

खेळ ऐन रंगात आला असताना कुणीतरी येऊन तुम्हाला खेळाच्या बाहेर काढावं, तसा मृत्यू तुम्हाला या जगातून घेऊन जातो.

तुमच्यावरील या ‘अन्याया’ विरुद्ध आवाज उठवायला देखील तुम्ही उरत नाही..

माझ्या मृत्यूनंतर मी माझा लाडका ‘उद्या’ पाहू शकणार नाही, या हतबलतेला माणूस सगळ्यात जास्त घाबरतो..

म्हणून हॉस्पिटलमधून घरी आल्यावर ठरवलं, यापुढचं आयुष्य उघड्या डोळ्यांनी जगायचं..

इतके दिवस जेवण नुसतंच ‘गिळलं’.
या पुढे एकेका घासाची मजा घ्यायची..
आयुष्याची ‘चव’ घेत जगायचं. ’

‘म्हणजे नक्की काय केलं?’
माझी उत्सुकता आता वाढली होती.

‘माझ्या आयुष्याची जबाबदारी मी स्वतःवर घेतली..

मी माझ्या आयुष्याचा Chief Executive Officer झालो !’

‘कंपनीचा सीईओ इतपत ठीक आहे. आयुष्याचा ‘सीईओ’ वगैरे… जरा जास्तच होत नाही का?’ मी विचारलं.

‘वेल… तुम्हाला काय वाटतं हे माझ्यासाठी महत्वाचं नाही..

आयुष्य कसं जगायचं याचे नियम मी ‘माझ्यापुरते केलेत त्यामुळे…’
‘मग..तुमच्या कंपनीत किती माणसं आहेत?’ त्याला मधेच तोडत, मस्करीच्या सुरात मी विचारलं.

‘म्हटलं तर खूप, म्हटलं तर कोणीच नाही.’ तो खांदे उडवत म्हणाला.

मला न कळल्याचं पाहून तो पुढे बोलू लागला..
‘मी फक्त माझ्या बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स सोबत डील करतो..

दे व्हर्च्युअली कंट्रोल माय लाईफ.

माझ्या बोर्डवर विविध माणसे डायरेक्टर आहेत..

फरहान अख्तर,
शिवाजी महाराज,
अब्दुल कलाम,
डॉ.बी आर आंबेडकर
चार्ली चॅप्लीन,
महात्मा गांधीजी,
अमिताभ,
हेलन केलर,
जे आर डी टाटा
इत्यादि इत्यादि’....

माझ्या चेहऱ्यावरील बदलत जाणारे भाव न्याहाळत त्याने आणखी काही नावे घेतली.

‘या लोकांबद्दल वाचलं तेव्हा एक लक्षात आलं.
या प्रत्येकामध्ये काहीना काही वैशिष्ट्य आहे.
काही क्वालिटीजमुळे मला ही माणसं ग्रेट वाटतात.

मी काय करतो… अं…उदाहरण देतो…
समजा खोटं बोलण्यावाचून पर्याय नाही अशा परिस्थितीत सापडलो की माझे ‘एथिक्स डायरेक्टर’ गांधीजींना विचारतो, काय करू?

मग ते सांगतील ते करतो.

व्यायाम करायला जाताना सकाळी उठायचा कंटाळा आला तर माझे ‘हेल्थ डायरेक्टर’ फरहान अख्तर मला काय म्हणतील, या विचाराने मी उठून बसतो आणि व्यायाम करायला जातो.

कधीतरी काहीतरी घडतं आणि खूप निराश वाटतं.

मग माझ्या ‘इन्स्पीरेशन डायरेक्टर’ हेलन केलरना पाचारण करतो. त्यांना भेटून आपल्या अडचणी फारच मामुली वाटू लागतात.

कधी दुःखी झालो तर ‘इंटरटेनमेंट डायरेक्टर’ चार्ली चॅप्लीन भेटायला येतात…’

माझ्या चेहऱ्यावरील विस्मयचकित भाव पाहून तो म्हणाला..
’मला माहितीय की ऐकायला हे सगळं विचित्र वाटत असेल'.
पण एक गोष्ट सांगतो. आयुष्य जगणं ही जर परीक्षा असेल, तर प्रत्येक माणसाने स्वतःचा ‘सीलॅबस’ बनवावा हे उत्तम !
आपण अनेकदा ‘इतरांप्रमाणे’ आयुष्य जगायचा प्रयत्न करतो आणि तिथेच फसतो..

जगायचं कसं? या प्रश्नावर चिंतन करणारी लाखो पुस्तके आज बाजारात आहेत.

हजारो वर्षे माणूस या प्रश्नाचं उत्तर शोधतोय..

गौतम बुद्धांनी मात्र फक्त चार शब्दांत उत्तर दिलं -Be your own light..

मला तर वाटतं, याहून सोपं आणि याहून कठीण स्टेटमेंट जगात दुसरं नसेल !’

मी त्या तरुणाला नांव विचारलं, त्याने लगेच सांगितलं. आम्ही एकमेकांचा निरोप घेतला.

चार पावलं चालून गेल्यावर तो तरुण पुन्हा वळून माझ्याकडे आला. म्हणाला, ‘सगळ्यात महत्वाचं सांगायचं राहिलं.

मी एका ऍक्सिडेंटमध्ये वाचलो आणि इतकं काही शिकलो.

तुम्ही…प्लीज..कुठल्या ऍक्सिडेंटची वाट पाहू नका !’ आम्ही दोघेही हसलो.

अपघात फक्त वाहनांमुळेच होतात, असं थोडीच आहे?
ओळखपाळख नसलेला तो तरुणही अपघातानेच भेटला की !

घरी जायला आम्ही रिक्षात बसलो. ‘प्ले झोन’ मध्ये खेळून पोरगं आधीच दमलं होतं..
वाऱ्याची झुळूक रिक्षात येऊ लागली..

मांडीवर बसल्या बसल्या मुलगा झोपून गेला होता..

त्याच्या मऊ मऊ केसांमधून हात फिरवताना संध्याकाळच्या गप्पा आठवत होत्या.

मनात आलं, ‘आपल्या पोराने जर असे ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ नेमले, तर त्यात ‘त्याचा बाप’ असेल का?’

परवाच्या रात्री बराच वेळ जागा राहिलो.

कोण जाणे, कदाचित हाच प्रश्न यापुढील आयुष्य ‘चवीने’ जगत राहायची उर्जा देत राहील !

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Faith

Beautiful Story

*A business man was late for his flight. He reached the boarding gate just before it closed. Sweating and out of breath, he scanned his boarding pass at the counter and quickly made his way to the plane.*

*Arriving at his seat, he greeted his companions  a middle-aged woman sitting at the window, and a little girl sitting on the aisle seat. After stowing his bag above, he took his place between them.*

*After the flight took off, he began a conversation with the little girl. She appeared to be about the same age as his daughter and was busy with her coloring book. He asked her a few usual questions, such as her age (eight), her hobbies (cartoons and drawing), as well as her favorite animal (horses are pretty, but she just loved cats).* *He found it strange that such a young girl would be traveling alone, but he kept his thoughts to himself and decided to keep an eye on her to make sure she was okay.*

*About an hour into the flight, the plane suddenly began experiencing extreme turbulence. The pilot came over the PA system and told everyone to fasten their seat belts and remain calm, as they had encountered rough weather.*

*Several times over the next half hour the plane made drastic dips and turns, shaking all the while. Some people began crying, and many*
*―like the woman in the window seating*
*―were praying intently.*
*The man was sweating and clenching his seat as tightly as he could, and exclaim “Oh my God!” with each increasingly violent shake of the plane.*

*Meanwhile, the little girl was sitting quietly beside him in her seat. Her coloring book and crayons were put away neatly in the seat pocket in front of her, and her hands were calmly resting on her legs. Incredibly, she didn't seem worried all.*

*Then, just as suddenly as it had begun, the turbulence ended. The pilot came on a few minutes later to apologize for the bumpy ride and to announce that they would be landing soon. As the plane began its descent, the man said to the little girl, “You are just a little girl, but I have never met a braver person in all my life! Tell me, dear, how is it that you remained so calm while all of us adults were so afraid?”*

*Looking him in the eyes, she said, *“My Father is the Pilot, and He's Taking Me Home."*
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*_Interpretation of this story:_*
*If we Recognise the Power of Faith...*
*We Won't Look for Miracles.*
*_May this beautiful story inspire us and brighten our path..._*

keep her happy.

A man married a beautiful girl. He loved her very much. One day she developed a skin disease. Slowly she started to lose her beauty. It so happened that one day her husband left for a tour. While returning he met with an accident and lost his eyesight. However their married life continued as usual. But as days passed she lost her beauty gradually. Blind husband did not know this and there  was not any difference in their married life. He continued to love her and she also loved him very much.
One day she died. Her death brought him great sorrow.
He finished all her last rites and wanted to leave that town.
A man from behind called and said, now how will you be able to walk all alone? All these days your wife used to help you.
He replied, I am not blind. I was acting,  because if she knew l could see her ugliness it would have pained her more than her disease. So I pretended to be blind. She was a very good wife. I only wanted to keep her happy.

Moral:- *Some times it is good for us to act blind and ignore one another's short comings, in order to be happy

_गर्भवती_हिरनी _एक_मार्मिक_कहानी

#_गर्भवती_हिरनी _एक_मार्मिक_कहानी  !

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी l  वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी की उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी l उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये l

वहां पहुँचते  ही उसे प्रसाव पीडा शुरू हो गयी l उसी समय आसमांन में घनाघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी l उसने दाये देखा तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था l  घबड़कर वह दाहिने मुडी तो वहां एक भूखा शेर झपटने  को तैयार बैठा था l सामने सुखि घास आग पकड चुकी थी और पिछे मुडी तो नदी में जल बहुत था l

मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसाव पीडा सें व्याकुल थी l
अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ?
क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ?
क्या शावक जीवित रहेगा ? या जंगल की आग सब कु्छ जला देगी ?
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?
या मादा हिरनी भुखे शेर का भोजन बनेगी ?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पिछे नदी है क्या करेगी वो ?

उसने अपने आप को शुन्य में छोड , अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी l 
कुदरत का कारिष्मा देखिये ..
* बिजली चमकी और शिकारी का तीर छोडते हुए आँखे चौंधिया गयी और उस का तीर हिरनी के पास से गुजरती हूई शेर को जा लगी l
* घनाघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी l
* हिरनी ने शावक को जन्म दिया l

हमारे जीवन में भी कु्छ क्षण ऐसे आते है जब हम चारो तरफ से समास्यों से घिरे होते है और कोई निर्णाय नहीं ले पाते l तब कुछ पल ऐसे आते हम शुन्य हो कर सब कुछ नियती के हाथो में छोड देते है जैसे उस हिरनी  ने किया l
जो पहली प्राथमिकता वो करो जैसे हिरनी ने शावक को जन्म दिया , प्रभु  आप के साथ है वो सब अच्छा करेंगे  l

अपने आप से पुछे .. आप कहां केन्द्रित है , आप का विश्वास और उम्मीद किस से है ।
आप किसी प्रकार की भय ,चिंता बिल्कुल ही न करे ।
परमात्मा सदा आपके साथ है ।

*जय श्री श्याम*

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