जंजीरे के दीवाण आवजी हरि चित्र के पुत्र बालाजी ने शिवाजी को पत्र लिखकर नौकरी की प्रार्थना की । शिवाजी ने उसे अपने यहां लेखक के स्थान पर रख लिया । महाराज उसके सुंदर अक्षरों पर मुग्ध थे ।
एक दिन शिवाजा ने बालाजी को बुलाकर पूछा 'कल हमने एक पत्र का उत्तर लिखने क लिए तुमस कहा था, सो लिखा ही होगा।'
बालाजी के हा कहने पर महाराज ने दिखाने का आग्रह किया। तब उसने कहा 'अभी साफ नहीं किया, कल दरबार में साफ करके सुनाऊंगा। '
शिवाजा ने फिर भी पढने का आग्रह किया तो बालाजी ने एक कागज पढना शुरू किया । जिसे सुनकर शिवाजी बडे प्रसन्न हुए।
बालाजी के जाने के बाद शिवाजी के सेवक रायबा ने कहा 'बलाजी जो कागज पढ रहा था, उस पर कुछ भी नही लिखा था।' शिवजी के आश्चर्य का ठिकाना नही रहा ।
अगले दिन दरबार में शिवाजी ने बालाजी से ऐसा करने का कारण पूछा। वह विनम्रता से बोला "क्षमा करें महाराज, व्यस्तता के कारण लिख नहीं पाया किंतु आपको नही कहने का साहस नहीं हुआ।"
शिवाजी ने प्रसन्न हो कहा "आज से तुम दरबार के मंत्री नियुक्त किए गए। तुम्हार अपराध का दंड यही है कि आज़ से तुम अपनी इस अद्भुत स्मरणशक्ति, अनोखे चातुर्य और मोती के समान अक्षरों का उपयोग स्वदेश हित को छोड़ किसी अन्य काम में नही करोगे। बालाजी ने जमीन पर सिर लगाकर शपथ ली ।
यह घटना समय सुचकता व कार्यं सजगता का उत्कृष्ट उदाहरण है। ठीक समय पर अपने काय को पूर्ण करने वाला ही जीवन में सफल होता है।
अंततक पढ़ने के लिये धन्यवाद। और भी मनोरंजक कहानियों के लिये इस ब्लॉग पर बने रहे और हर कहानी को शेयर करते रहे। मैं आपको मुफ्त कहानी दूंगी आप मुफ्त में इसे शेयर करते रहिए।
No comments:
Post a Comment