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Friday, 24 April 2020

मातृभक्त ध्रुव ने स्वर्ग गमन भी माता साथ ही किया

सम्राट उत्तानपाद और सुमति का पुत्र ध्रुव अत्यंत मातृ भक्त था। वह सर्वथा माता के अनुकूल आचरण करता था। जैसे माता कह दे, ध्रुव उससे रंचमात्र भी नहीं हटता था। जब माता सुमति वृद्ध हुई तो उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और वन जाने की इच्छा व्यक्त की। ध्रुव उस समय राजा थे। उन्होंने माता की इच्छा का आदर करते हुए माता के वन गमन का प्रबंध किया। ध्रुव का व्यक्तित्व राजा और ऋषि दोनों के गुणों से समन्वित था । सात्विक जीवन जीने वाले ध्रुव के अंत समय मैं जब स्वर्ग का विमान उन्हें लेने के लिए आया तो मृत्यु उनके समक्ष दंडवत होकर बोली -भगवान, आप मेरे मस्तक पर अपने पैरों का स्पर्श करते हुए विमान की सीढ़ियां चढ़े। मैं धन्य हो जाऊंगी। ध्रुव ने ऐसे ही किया। तत्काल बाद उन्होंने देवदूत को विमान मृत्यु लोक की और पुनः मोड़ने के लिए कहा। कारण पूछने पर वे बोले - वहा मेरी माताश्री है, जो मेरे समस्त ज्ञान की स्ट्रोटस्विनी है । उनके बिना मेरे स्वर्ग रोहन अधूरा रह जाएगा। तभी देवदूतो ने उन्हें संकेत से एक अति भव्य विमान दिखाया और कहां कि हमने आपकी माताश्री को आपसे पहले ही स्वर्ग भेजने की व्यवस्था कर दी है। मातृ भक्त ध्रुव को अत्यंत संतोष हुआ कि स्वर्ग में भी मैं  उसी मातृछाया में रहूंगा जो सदैव मेरे सन्मार्ग का संबल रही है। वस्तुतः इस भर्ती पर मा ईश्वर के प्रति स्वरूप है। यदि ऐसे मानकर उसके प्रति अटल निष्ठा रखी जाए तो दिव्य शांति व परम सुख का जीवन में स्थाई निवास हो जाता है।


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