कुछ रिश्ते परिभाषाओं में क़ैद नहीं होते..
पर होते बहुत ही अनमोल है....
=====जो कोई समझ न सके वो बात हैं हम,
जो ढल के नयी सुबह लाये वो रात हैं हम,
छोड़ देते हैं लोग रिश्ते बनाकर,
जो कभी न छूटे वो साथ हैं हम।
=====रिश्ते मन से बनते हैं बातों से नहीं,
कुछ लोग बहुत सी बातों के बाद भी अपने नहीं हो पाते
और कुछ शांत रहकर भी अपने बन जाते हैं.
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Image Credit: unclejokes.com
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आदमी जब पत्तल में खाना खाता था और घर मे जब कोई मेहमान आता था.
मेहमान को देख के वह हरा हो जाता था, स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था....
बाद में जब वह मिट्टी के बर्तन में खाने लगा, रिश्तों को जमीन से जुड़कर निभाने लगा..
फिर जब पीतल के बर्तन उपयोग में लेता था, रिश्तों को साल छः महीने में चमका लेता था..
फिर परिवार स्टील के बर्तन में खाने लगा रिश्तों को भी लंबे समय तक निभाने लगा..
लेकिन बर्तन कांच के जब से बरतने लगे, एक हल्की सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे..
अब बर्तन थर्मोकोल पेपर के होने लगे, सारे सम्बन्ध भी अब यूज़ एंड थ्रो होने लगे....
=====तलाश सिर्फ सुकून कि होती हैं नाम रिश्ते का चाहे जो भी हो
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रिश्ते बनाना इतना आसान जैसे - 'मिट्टी' पर 'मिट्टी' से "मिट्टी" लिखना.
लेकिन रिश्ते निभाना उतना ही मुश्किल जैसे 'पानी' पर 'पानी' से "पानी" लिखना.
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कमिया एक दूसरे की क्या खूब देखी हमने,
खूबियाँ रिश्ते की गज़ब नज़र अंदाज़ हुई......!
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रिश्ते हैं आजकल खामोश पहाडियो की तरह
जब तक आवाज़ न दें..उधर से आवाज़ आती नहीं!!"
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उलझे जो कभी हमसे तो तुम सुलझा लेना
तुम्हारे हाथ में भी रिश्ते का एक सिरा होगा
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हम फूल तो नहीं पर महकना जानते है,
बिना रोये गम भुलाना जानते है..
लोग खुश होते है हमसे क्योकि
हम बिना मिले ही रिश्ते निभाना जानते है
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